बुधवार, 5 जुलाई 2017


हमारा दुर्लभ मानव शरीर स्वर्ण पात्र के समान है। इसमें पूँजीवादी विकास की मादक मदिरा ,अधिनायकवादी सोच की प्रतिगामी जड़ता और साम्प्रदायिक सोच की अंधभक्ति का जहर भरने के बजाय,क्रांतिकारी सोच का ,नवोन्मेष जागरूकता का और समानता का अमृत भर दो !

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