हमारा दुर्लभ मानव शरीर स्वर्ण पात्र के समान है। इसमें पूँजीवादी विकास की मादक मदिरा ,अधिनायकवादी सोच की प्रतिगामी जड़ता और साम्प्रदायिक सोच की अंधभक्ति का जहर भरने के बजाय,क्रांतिकारी सोच का ,नवोन्मेष जागरूकता का और समानता का अमृत भर दो !
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें