रविवार, 21 अगस्त 2016

सावधान ! अंधश्रद्धा से ही तीसरा नेत्र खुलता है।

जो निरीह प्राणी अंधश्रद्धा में आकण्ठ डूबे हैं , जो 'त्रिनेत्र'-भक्ति के बहाने गाँजा -भाँग -धतूरे  के उपासक हैं ,शिव शंकर की तरह  यदा -कदा उनका भी तीसरा नेत्र खुल जाता है। लेकिन उनका यह तीसरा नेत्र किसी कामदेव को भस्म करने के लिए नहीं खुलता ,सामाजिक समरसताके लिए नहीं खुलता ,ओलम्पिक खेलों में मेडल लानेके लिए नहीं खुलता ,भृष्ट -बदनाम नेताओं और रिश्वतखोर अफसरों के खिलाफ नहीं खुलता ,अन्याय -शोषण और महिला उत्पीड़न के खिलाफ नहीं खुलता ,बल्कि मृत पशु उठानेवाले ,कचरा फेंकनेवाले निर्दोष दलितों पर ही इन धर्मांध भक्तों का तीसरा नेत्र खुलता है। धर्मनिरपेक्षता के दूध में साम्प्रदायिकता का नीबू निचोड़ने के लिए भी कभी-कभी उनका तीसरा नेत्र खुल जाता है। इसी तरह की मजहबी अंधश्रद्धा  इस्लामिक कट्टरपंथियों को भी जेहादी बनाती है और वे दहशतगर्द शैतान यदा -कदा अमनपसन्द आवाम पर अपना रक्तरंजित तीसरा नेत्र खोलते रहते हैं।और इसी तरह हर दबंग व्यक्ति किसी कमजोर पर ,ताकतवर समाज किसी कमजोर समाज पर और ताकतवर राष्ट्र - किसी कमजोर और गरीब देश पर तीसरा नेत्र खोलते रहते हैं ।

भारतीय योगियों,गौरक्षकों और अवतारी महापुरुषों के पास तीसरा नेत्र बहुतायत से पाया जाता है। किन्तु यह खुलता  तभी है ,जब किसी का अनिष्ट करना हो। अर्थात जब किसी को 'भस्म करना 'हो ! जो वरुण के उपासक हैं वे अपने इष्टदेव की आराधना के लिए कुआँ -बावड़ी ,नदी -नाले ,ताल -तलैयों की ऐंसी -तैसी करने में जी जान से जुटे हैं। जो  'धरती माता ' के आराधक हैं ,वे पर्यावरण  सहित नदियों और पर्वतों का कितना भला कर रहे हैं यह दिल्ली में श्री-श्री के ताम झाम के मार्फत हुए यमुना उद्धार से या एनजीटी की रिपोर्ट से  भी बखूबी समझा जा सकता है। जो गौरक्षक हैं उनकी लीला  तो अपरम्पार है, क्योंकि वे तो प्रधानमंत्रीको ही धमका रहे हैं। आधुनिक  साइंस -उन्नत सूचना संचार तकनीकी और मीडिया की असीम अनुकम्पा से सबको सब कुछ दिख रहा है। किन्तु  जिनको पर्यावरण का तातपर्य ही नहीं मालूम वे लाखों तीर्थ यात्री ,आबाल-बृद्ध नर-नारी  ही आवाम के हिस्से के रूप में जब न केवल नदियों को बल्कि पहाड़ों को भी प्रदूषित करने में जी जान से जुटे हैं। अंध श्रद्धालु  भक्तगण -सड़ी-गली फूलमालाएं ,पूजा का निर्माल्य ,मृत मानव देह , मृत पशु देह और अध् जली लाशों को गंगा-यमुना या  नर्मदा जैसी पावन नदियों में बाइज्जत विसर्जन करते रहते हैं। मुर्दों के नए -पुराने वस्त्र ,अधजली अस्थियाँ बहाये बिना तो 'भवसागर'पर होना  सम्भव ही नहीं है।  यदि इन विनाशकारी परम्पराओं को कदाचरण कहें तो अंधश्रद्धा का तीसरा बिकराल तीसरा नेत्र खुलना सम्भव है।

शनिवार, 20 अगस्त 2016

रियो ओलम्पिक में भारत की बुरी तरह धुनाई हुई है !

 आज 'अंतर्राष्टीय सीनियर सिटीजन्स डे ' है। और आज की ही खबर है कि केरल में एक बुजुर्ग महिला पर सुबह समुद्र किनारे 'शौच' जाने पर सैकड़ों कुत्तों ने एक साथ हमला बोल दिया। उस बृद्धा को मरणोपरांत अस्पताल ले जाया  गया। इस घटना से अनेक सवाल उठते हैं। पहला तो यही कि जब अभिनेत्री विद्या बालान से लेकर देश के प्रधान -  मंत्री खुद ही ' शौच' की सोच में रात दिन डूबे रहते हैं । तो फिर उसका सकारात्मक परिणाम क्यों नहीं ?  केरल जैसे तथाकथित सर्वशिक्षित प्रदेश की गरीब बृद्ध महिलाओं को समुद्र किनारे 'शौच' के लिए क्यों जाना पड़ रहा है? आजादी के बाद से अब तक जो भी दल या नेता वहाँ सत्ता में रहे उनको शर्म क्यों नहीं आ रही ?

इन दिनों भारत के सक्षम मध्यम वर्गीय बुर्जुवा लोग रियो ओलम्पिक के संदर्भ में शोसल मीडिया पर कुछ इस तरह गदगदायमान हैं, मानों ओलम्पिक सूची में भारतने अमेरिकाको पीछे छोड़ दिया  हो । कुछ चवन्नीछाप पैटी बुर्जुवा लोग अपनी औकात ही भूल जाते हैं कि जिस देश के सवा सौ करोड़ देशवासियों में से ९९%  ग्रामीण भारत खुले में शौच करने को आज भी मजबूर हैं। जिस देश के शहरी गरीब मजदूर सुबह-सुबह लौटा लेकर रेल की पटरी के किनारे जाने को मजबूर हैं ,जिस देश में क्रिकेट के खिलाडी को 'भगवान्' माना जाता हो , जिस देश के मंत्री और अफसर भृष्टाचार में आकण्ठ डूबे हों ,उस देश के  खिलाडियों से पदकों की उम्मीद करना ही नादानी है। वेशक साक्षी और सिंधु ने अपने देश के लिए जो  किया वह अतुलनीय है और देश उन्हें जो दे रहा है वह भी पर्याप्त है। किन्तु जब देश के प्रधानमंत्री खुद ही खिलाडियों को ससम्मान ओलम्पिक के लिए विदा करें और तमाम सुविधाओं का इंतजाम करें ,और सभी खिलाड़ी अपनी असफलताओं के बहाने पेश करें, तो यह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। पिछले ओलम्पिक में भारत की स्थिति इतनी खराब नहीं थी।बल्कि इस बार पहले से ज्यादा पदकों की उम्मीद थी। इसलिए वर्तमान रियो ओलम्पिक में भारत की दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। अन्यथा 'वही ढाक के तीन पात ' अगले किसी ओलम्पिक में भी  हाथ मलते रह जायेंगे। और यह भी सुनिश्चित था कि यदि भारतीय खिलाड़ी रियो ओलम्पिक से  १०-२०  मेडल ले आते तो उसका श्रेय मोदी जी को और एनडीए सरकार को ही दिया जाता । चूँकि रियो ओलम्पिक में भारत की बुरी तरह धुनाई हुई है अतः इसका श्रेय भी तय होना चाहिए !कुछ उत्साहीलाल  कांसे और चाँदी  के एक-एक मैडल पर फ़िदा होकर कुछ ज्यादा ही  पुलकायमान हो रहे हैं , मानों ओलम्पिक सूची में भारत अव्वल ही आ गया हो ! इस तरह तो दुनिया के किसी भी देश के लोगों का आचरण नहीं देखा -सूना गया। श्रीराम तिवारी !

जो अंधश्रद्धा में आकण्ठ डूबे हैं , जो 'त्रिनेत्र'की भक्ति के बहाने गाँजा -भाँग -धतूरे  के उपासक हैं ,शिव की तरह समय-समय पर उनका भी तीसरा नेत्र खुलने लग जाता है। लेकिन उनका यह त्रिनेत्र किसी कामदेव को भस्म करने के लिए नहीं खुलता ,अपितु आर्थिक -गोरखधंधे के लिए ,आश्था के बहाने सामाजिक समरसता के दूध में नीबू रस की भूमिका अदा करने के लिए  ही उघडता है।

आधुनिक योगियों,गौरक्षकों और अवतारी महापुरुषों के पास तीसरा नेत्र बहुतायत से पाया जाता है। किन्तु यह खुलता  तभी है ,जब किसी का अनिष्ट करना हो। अर्थात जब किसी को 'भस्म करना 'हो ! जो वरुण के उपासक हैं वे अपने इष्टदेव की आराधना के लिए कुआँ -बावड़ी ,नदी -नाले ,ताल -तलैयों की ऐंसी -तैसी करने में जी जान से जुटे रहते हैं। जो 'गौ -द्विज- धरती ' के सच्चे आराधक हैं ,वे तो पर्यावरण  सहित नदियों ,पर्वतों का बहुत ख्याल रखते हैं। किन्तु जिनको पर्यावरण का तातपर्य ही नहीं मालूम वे लाखों तीर्थ यात्री ,आबाल-बृद्ध नर-नारी न केवल नदियों को बल्कि पहाड़ों को भी प्रदूषित करने में जी जान से जुटे   हैं। अंध श्रद्धालु  भक्त गण - सड़े -गले फल - फूल,पूजा का निर्माल्य ,मृत मानव देह , मृत पशु देह और अध् जली लाशों को गंगा-यमुना नर्मदा में बाइज्जत विसर्जन करते रहते हैं। मुर्दों के नए -पुराने वस्त्र ,अस्थियाँ बहाना तो जन्म सिध्द अधिकार और 'पवित्र संस्कार' है। यदि इस परम्परा को कदाचरण कहें तो अंधश्रद्धा का तीसरा नेत्र खुलना सम्भव है।  सावधान ! अंधश्रद्धा से ही तीसरा नेत्र खुलता है।

सोमवार, 15 अगस्त 2016

त्वरित टिप्पणी -सार्वजानिक उपक्रमों के प्राफिट का श्रेय मोदी जी को बिकुल नहीं है।

 ७० वें स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए प्रधान मंत्री मोदी जी ने जो कुछ कहा उससे किसी को शायद ही कोई शिकायत होगी। बल्कि मुझे तो उनका पीओके , गिलगिलत - बलूचिस्तान वाला वक्तव्य बहुत सटीक लगा। इसके अलावा उन्होंने फ़ौज के जवानों को याद किया। किसानों - महिलाओं की और दलितों की बात की। सौर ऊर्जा ,दालों की कमी और पेट्रोलियम आयात पर बचाये गए बीस हजार करोड़ रुपयों की बात की ,उन्होंने सार्वजानिक उपक्रमों को घाटे से उबारने और मुनाफे में लाने का दावा किया,उन्होंने महँगाई  कंट्रोल में होने की बात की औरआगामी तीन वर्षों में देश के पांच करोड़ अन्त्यज गरीबों तक एलपीजी सुविधा पहुंचाने का वादा भी दुहराया। चूँकि भाषण का मामला वन वे है, मोदी जी प्रधान मंत्री हैं और लालकिले की प्राचीर से उन्होंने जो कुछ भी कहा है ,वह देश की आवाज है ,यह भाषण देश की पालिसी और प्रोग्राम को भी दर्शाता है। इसलिए  स्वाधीनता दिवस पर अधिकांस देशवासियों का जश्ने आजादी की शुभकानाओं के आदान - प्रदान पर आत्मतुष्ट हो जाना स्वाभाविक है। लेकिन विवेकशील राष्ट्रीय चेतनाका दायित्व है कि सापेक्ष सत्य को स्वीकार करे,और अर्धसत्यके कुहांसे को कोई रात का अँधेरा न समझ बैठे,यह  सम्पूर्ण भारतीय जनमानस का दायित्व  है।

लाल किले की प्राचीर से सत्तरवें स्वाधीनता दिवस के भाषण में मोदीजी ने एयर इण्डिया ,शिपिंग कारपोरेशन और बीएसएनएल समेत अन्य सार्वजनिक उपक्रमों को 'ऑपरेशनल प्रॉफिट' में होना बताया है ,यह न केवल मोदी सरकार के लिए ,न केवल हितग्राहियों के लिए बल्कि पूरे राष्ट्रके लिए आत्म गौरव और प्रशन्नता की बात है। किन्तु इसका श्रेय मोदी जी को बिकुल नहीं है। क्योंकि यदि उनकी वजह से बीएसएनएल में नफा  हुआ है ,तो उनके होते हुए एमटीएनएल घाटे में क्यों है ? क्योंकि भाजपा और एनडीए के चुनावी घोषणा पत्र में और कार्यनीतिक  एजेंडे में तो भारत के सार्वजनिक उपक्रम महज  'सफेद हाथी' कहा गया है । मोदीजी और भाजपा वाले तो निजीकरण के समर्थक हैं। एनडीए -प्रथम याने  अटलबिहारी सरकार के समय से ही उन्होंने सभी सार्वजनिक उपक्रमों में  १००%  एफडीआई के लिए जोर लगाया है। पूँजी निवेश की वैश्विक 'बनिया लाबी'का मोदी जी के सर पर हाथ है। इसी भृष्ट लॉबी  के इशारे पर अटलजी के दौर में स्वर्गीय प्रमोद महाजन और अरुण शौरी ने आनन्-फानन निजी क्षेत्र को लाइसेंस बाँटे थे। और देश के दुधारू डिपार्टमेंट -डीओटी को चूना लगाया था,  निजीकरण का श्रीगणेश किया था। जो लोग टाटा,अम्बानी,अडानी, सुनील मित्तल भारती के खैरख्वाह होंगे, वे बीएसएनएल का मुनाफा क्यों चाहेंगे ? वे तो उसे बेमौत मरते  देखना चाहते हैं।

जिस स्पेक्ट्रम घोटालेकी बात मोदीजीऔर भाजपावाले चटखारे लेकर बार-बार करते रहतेहैं , उसका बीजांकुरण भले ही नरसिम्हाराव ,सुखराम , दयानिधि मारन ने किया हो ,किन्तु असल खिलाड़ी तो प्रमोद महाजन और अरुण शौरी ही थे। वेशक सन २००४ के बाद डॉ मनमोहनसिंह की यूपीए सरकार में द्रुमक के भृष्ट संचार मंत्री ए राजा और करूणानिधि की बेटी कनिमोझी ने भी खूब घोटाले किये। डॉ मनमोहन सिंह ,सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी यह सब रोकने में और  मॉनिटरिंग करने में असफल रहे।  सार्वजानिक उपक्रमों को बर्बाद करने के लिए एनडीए और यूपीए दोनों बराबर के जिम्मेदार हैं। पहले तो अटलबिहारी सरकार ,फिर डॉ मनमोहनसिंह की दस सालाना यूपीए सरकार ने और मोदी सरकार ने लगातार विश्व बैंक और अमेरिकी दवाव में आकर न केवल बीएसएनएल बल्कि सभी सार्वजनकि उपक्रमों में १००% एफडीआई के दरवाजे खोल दिए हैं । किन्तु वामपंथी ट्रेड यूनियनों ने   यह राष्ट्रघात नहीं  होने दिया। अब यदि बिना  १ % एफडीआई के भी बीएसएनएल ऑपरेशनल  प्रॉफिट में आ गया है तो उसका श्रेय संगठित ट्रेडयूनियन आंदोलन को जाता है। क्योंकि वेशक निवृतमान संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद जी का भी सहयोग सराहनीय रहा है ,इस नाते मोदी जी भी अपनी पीठ खुद थोक सकते हैं। लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब  दूर संचार विभाग की  मोनोपाली थी तब भी भारत सरकार के खजाने में अरबों-खरबों डॉलर कमाकर यही दिया करता था। एक बढ़िया सरकारी विभाग को सार्वजानिक उपक्रम बनाया ही इसलिए गया था कि वह घाटे में आ जाये ,और तब सरकार उसका निजीकरण करदे। इसीलिये तत्कालीन ही एनडीए की अटल सरकार ने इसको जबरन  लिमिटेड कम्पनी बना दिया। लेकिन संयोग से बीएसएनएल के कर्मचारी/अधिकारी का बहुत मजबूत और संगठित मोर्चा  है,इसीलिये अब तक बीएसएनएल बचा हुआ है। इसमें मोदी जी की कोई मेहरवानी नहीं है।

भारत जैसे विशाल लोकतान्त्रिक देश के प्रधान मंत्री की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह कम से कम स्वाधीनता दिवस पर तो सच बोलें ! यदि  एफडीआई के बगैर बीएसएनएल मुनाफा दे सकता है तो  एमटीएनएल पब्लिक शेयर का क्या मतलब है ?जबकि वह घाटे में जा रहा है। मोदी जी एमटीएनएल को प्राफिट में लाने का प्रयास क्यों नहीं करते?  बंद हो चुके अनेक उपक्रमों की सुध क्यों नहीं लेते ?चूँकि आमतौर पर  प्रधानमंत्री द्वारा  स्वाधीनता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से दिए गए भाषण के निहतार्थ  बहुत व्यापक और दूरगामी होते हैं ,इसलिए उन्हें अपनी कॉलर ऊंची करने या आत्मप्रशंसा करने से बचना चाहिए। उनकी जग हँसाई से देश की भी जग हंसाई हो सकती है। ।  श्रीराम तिवारी। 

शनिवार, 6 अगस्त 2016

यह तो उनके लिए आन-बान -शान की बात है।


बहुत ही दुखद सूचना है कि  राजस्थान की एक सरकारी गौशाला में  में ५०० गायें एक साथ मार दीं गयीं गयीं ! ये गायें कैसे मरीं? क्यों मरी ? उनकी मौत के लिए कौन जिम्मेदार है ? यह तो मुख्यमंत्री वसुंधरा जी ही बता पाएंगी। और यदि सचाई जानना है तो किसी ऐसे पशु चिकित्सक को खोजना पडेगा जो बिना व्यापम भृष्टाचार के ,बिना रिश्वत के और बिना किसी नेता के सहयोग के भी डॉ बन पाया हो !हालाँकि  गौलोक धाम जा चुकी 'गौमाताओं'को कोई इससे कोई फर्क नहीं पड़ताकि उन्हें किसने मारा और क्यों मारा ? लेकिन इस संदर्भमें उन सच्चे 'गौसेवकों' की भूमिका पर सभी की नजर रहेगी,जिन्होंने 'गौरक्षा 'के नाम पर कानून को अपने हाथमें ले रखाहै और देशभर में हिंसक  उपद्रव मचा रखा है।

भारत की जनता और दुनिया के तमाम शांति-प्रेमी लोग इंतजार कर रहे हैं किये 'स्वयम्भू' गौसेवक कब अपनी ५०० गौमाताओं के क्रूर हत्यारों के शीश काटकर जयपुर स्थित राजभवन के समक्ष पेश करते हैं। क्योंकि यह तो उनके लिए आन-बान -शान की  बात है। वे  जब किसी अज्ञात पशु के थोड़े से मांस के  लिए हरियाणा में किसी 'अखलाख' को मार सकते हैं । जब गुजरात में किसी बूढ़े -बीमार मृत पशु की देह उठाने वालों को , जंगल में पशु का शव फेंकने गए गरीब 'दलित बंधुओं' को महज चमड़ा उधेड़ने पर लहूलुहान कर सकते हैं ,उन्हें धर्म-परिवर्तन के लिए मजबूर कर सकते हैं ,तो ५०० गौमाताओं के हत्यारों को कैसे छोड़ा जा सकता है? यदि 'हिंदुत्व वीरों ' ने इन गौ माताओं की हत्याका बदला नहीं लिया और 'कानून को हाथ में नहीं लेने' का पाखण्ड किया तो उन्हें इसका जबाब देना होगा कि उन्होंने गुजरात में दलितों को क्यों पीटा ? उन्होंने हरियाणा में 'अखलाख को क्यों मारा ?

श्रीराम तिवारी !