आज 'अंतर्राष्टीय सीनियर सिटीजन्स डे ' है। और आज की ही खबर है कि केरल में एक बुजुर्ग महिला पर सुबह समुद्र किनारे 'शौच' जाने पर सैकड़ों कुत्तों ने एक साथ हमला बोल दिया। उस बृद्धा को मरणोपरांत अस्पताल ले जाया गया। इस घटना से अनेक सवाल उठते हैं। पहला तो यही कि जब अभिनेत्री विद्या बालान से लेकर देश के प्रधान - मंत्री खुद ही ' शौच' की सोच में रात दिन डूबे रहते हैं । तो फिर उसका सकारात्मक परिणाम क्यों नहीं ? केरल जैसे तथाकथित सर्वशिक्षित प्रदेश की गरीब बृद्ध महिलाओं को समुद्र किनारे 'शौच' के लिए क्यों जाना पड़ रहा है? आजादी के बाद से अब तक जो भी दल या नेता वहाँ सत्ता में रहे उनको शर्म क्यों नहीं आ रही ?
इन दिनों भारत के सक्षम मध्यम वर्गीय बुर्जुवा लोग रियो ओलम्पिक के संदर्भ में शोसल मीडिया पर कुछ इस तरह गदगदायमान हैं, मानों ओलम्पिक सूची में भारतने अमेरिकाको पीछे छोड़ दिया हो । कुछ चवन्नीछाप पैटी बुर्जुवा लोग अपनी औकात ही भूल जाते हैं कि जिस देश के सवा सौ करोड़ देशवासियों में से ९९% ग्रामीण भारत खुले में शौच करने को आज भी मजबूर हैं। जिस देश के शहरी गरीब मजदूर सुबह-सुबह लौटा लेकर रेल की पटरी के किनारे जाने को मजबूर हैं ,जिस देश में क्रिकेट के खिलाडी को 'भगवान्' माना जाता हो , जिस देश के मंत्री और अफसर भृष्टाचार में आकण्ठ डूबे हों ,उस देश के खिलाडियों से पदकों की उम्मीद करना ही नादानी है। वेशक साक्षी और सिंधु ने अपने देश के लिए जो किया वह अतुलनीय है और देश उन्हें जो दे रहा है वह भी पर्याप्त है। किन्तु जब देश के प्रधानमंत्री खुद ही खिलाडियों को ससम्मान ओलम्पिक के लिए विदा करें और तमाम सुविधाओं का इंतजाम करें ,और सभी खिलाड़ी अपनी असफलताओं के बहाने पेश करें, तो यह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। पिछले ओलम्पिक में भारत की स्थिति इतनी खराब नहीं थी।बल्कि इस बार पहले से ज्यादा पदकों की उम्मीद थी। इसलिए वर्तमान रियो ओलम्पिक में भारत की दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। अन्यथा 'वही ढाक के तीन पात ' अगले किसी ओलम्पिक में भी हाथ मलते रह जायेंगे। और यह भी सुनिश्चित था कि यदि भारतीय खिलाड़ी रियो ओलम्पिक से १०-२० मेडल ले आते तो उसका श्रेय मोदी जी को और एनडीए सरकार को ही दिया जाता । चूँकि रियो ओलम्पिक में भारत की बुरी तरह धुनाई हुई है अतः इसका श्रेय भी तय होना चाहिए !कुछ उत्साहीलाल कांसे और चाँदी के एक-एक मैडल पर फ़िदा होकर कुछ ज्यादा ही पुलकायमान हो रहे हैं , मानों ओलम्पिक सूची में भारत अव्वल ही आ गया हो ! इस तरह तो दुनिया के किसी भी देश के लोगों का आचरण नहीं देखा -सूना गया। श्रीराम तिवारी !
जो अंधश्रद्धा में आकण्ठ डूबे हैं , जो 'त्रिनेत्र'की भक्ति के बहाने गाँजा -भाँग -धतूरे के उपासक हैं ,शिव की तरह समय-समय पर उनका भी तीसरा नेत्र खुलने लग जाता है। लेकिन उनका यह त्रिनेत्र किसी कामदेव को भस्म करने के लिए नहीं खुलता ,अपितु आर्थिक -गोरखधंधे के लिए ,आश्था के बहाने सामाजिक समरसता के दूध में नीबू रस की भूमिका अदा करने के लिए ही उघडता है।
आधुनिक योगियों,गौरक्षकों और अवतारी महापुरुषों के पास तीसरा नेत्र बहुतायत से पाया जाता है। किन्तु यह खुलता तभी है ,जब किसी का अनिष्ट करना हो। अर्थात जब किसी को 'भस्म करना 'हो ! जो वरुण के उपासक हैं वे अपने इष्टदेव की आराधना के लिए कुआँ -बावड़ी ,नदी -नाले ,ताल -तलैयों की ऐंसी -तैसी करने में जी जान से जुटे रहते हैं। जो 'गौ -द्विज- धरती ' के सच्चे आराधक हैं ,वे तो पर्यावरण सहित नदियों ,पर्वतों का बहुत ख्याल रखते हैं। किन्तु जिनको पर्यावरण का तातपर्य ही नहीं मालूम वे लाखों तीर्थ यात्री ,आबाल-बृद्ध नर-नारी न केवल नदियों को बल्कि पहाड़ों को भी प्रदूषित करने में जी जान से जुटे हैं। अंध श्रद्धालु भक्त गण - सड़े -गले फल - फूल,पूजा का निर्माल्य ,मृत मानव देह , मृत पशु देह और अध् जली लाशों को गंगा-यमुना नर्मदा में बाइज्जत विसर्जन करते रहते हैं। मुर्दों के नए -पुराने वस्त्र ,अस्थियाँ बहाना तो जन्म सिध्द अधिकार और 'पवित्र संस्कार' है। यदि इस परम्परा को कदाचरण कहें तो अंधश्रद्धा का तीसरा नेत्र खुलना सम्भव है। सावधान ! अंधश्रद्धा से ही तीसरा नेत्र खुलता है।
इन दिनों भारत के सक्षम मध्यम वर्गीय बुर्जुवा लोग रियो ओलम्पिक के संदर्भ में शोसल मीडिया पर कुछ इस तरह गदगदायमान हैं, मानों ओलम्पिक सूची में भारतने अमेरिकाको पीछे छोड़ दिया हो । कुछ चवन्नीछाप पैटी बुर्जुवा लोग अपनी औकात ही भूल जाते हैं कि जिस देश के सवा सौ करोड़ देशवासियों में से ९९% ग्रामीण भारत खुले में शौच करने को आज भी मजबूर हैं। जिस देश के शहरी गरीब मजदूर सुबह-सुबह लौटा लेकर रेल की पटरी के किनारे जाने को मजबूर हैं ,जिस देश में क्रिकेट के खिलाडी को 'भगवान्' माना जाता हो , जिस देश के मंत्री और अफसर भृष्टाचार में आकण्ठ डूबे हों ,उस देश के खिलाडियों से पदकों की उम्मीद करना ही नादानी है। वेशक साक्षी और सिंधु ने अपने देश के लिए जो किया वह अतुलनीय है और देश उन्हें जो दे रहा है वह भी पर्याप्त है। किन्तु जब देश के प्रधानमंत्री खुद ही खिलाडियों को ससम्मान ओलम्पिक के लिए विदा करें और तमाम सुविधाओं का इंतजाम करें ,और सभी खिलाड़ी अपनी असफलताओं के बहाने पेश करें, तो यह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। पिछले ओलम्पिक में भारत की स्थिति इतनी खराब नहीं थी।बल्कि इस बार पहले से ज्यादा पदकों की उम्मीद थी। इसलिए वर्तमान रियो ओलम्पिक में भारत की दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। अन्यथा 'वही ढाक के तीन पात ' अगले किसी ओलम्पिक में भी हाथ मलते रह जायेंगे। और यह भी सुनिश्चित था कि यदि भारतीय खिलाड़ी रियो ओलम्पिक से १०-२० मेडल ले आते तो उसका श्रेय मोदी जी को और एनडीए सरकार को ही दिया जाता । चूँकि रियो ओलम्पिक में भारत की बुरी तरह धुनाई हुई है अतः इसका श्रेय भी तय होना चाहिए !कुछ उत्साहीलाल कांसे और चाँदी के एक-एक मैडल पर फ़िदा होकर कुछ ज्यादा ही पुलकायमान हो रहे हैं , मानों ओलम्पिक सूची में भारत अव्वल ही आ गया हो ! इस तरह तो दुनिया के किसी भी देश के लोगों का आचरण नहीं देखा -सूना गया। श्रीराम तिवारी !
जो अंधश्रद्धा में आकण्ठ डूबे हैं , जो 'त्रिनेत्र'की भक्ति के बहाने गाँजा -भाँग -धतूरे के उपासक हैं ,शिव की तरह समय-समय पर उनका भी तीसरा नेत्र खुलने लग जाता है। लेकिन उनका यह त्रिनेत्र किसी कामदेव को भस्म करने के लिए नहीं खुलता ,अपितु आर्थिक -गोरखधंधे के लिए ,आश्था के बहाने सामाजिक समरसता के दूध में नीबू रस की भूमिका अदा करने के लिए ही उघडता है।
आधुनिक योगियों,गौरक्षकों और अवतारी महापुरुषों के पास तीसरा नेत्र बहुतायत से पाया जाता है। किन्तु यह खुलता तभी है ,जब किसी का अनिष्ट करना हो। अर्थात जब किसी को 'भस्म करना 'हो ! जो वरुण के उपासक हैं वे अपने इष्टदेव की आराधना के लिए कुआँ -बावड़ी ,नदी -नाले ,ताल -तलैयों की ऐंसी -तैसी करने में जी जान से जुटे रहते हैं। जो 'गौ -द्विज- धरती ' के सच्चे आराधक हैं ,वे तो पर्यावरण सहित नदियों ,पर्वतों का बहुत ख्याल रखते हैं। किन्तु जिनको पर्यावरण का तातपर्य ही नहीं मालूम वे लाखों तीर्थ यात्री ,आबाल-बृद्ध नर-नारी न केवल नदियों को बल्कि पहाड़ों को भी प्रदूषित करने में जी जान से जुटे हैं। अंध श्रद्धालु भक्त गण - सड़े -गले फल - फूल,पूजा का निर्माल्य ,मृत मानव देह , मृत पशु देह और अध् जली लाशों को गंगा-यमुना नर्मदा में बाइज्जत विसर्जन करते रहते हैं। मुर्दों के नए -पुराने वस्त्र ,अस्थियाँ बहाना तो जन्म सिध्द अधिकार और 'पवित्र संस्कार' है। यदि इस परम्परा को कदाचरण कहें तो अंधश्रद्धा का तीसरा नेत्र खुलना सम्भव है। सावधान ! अंधश्रद्धा से ही तीसरा नेत्र खुलता है।

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