भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम [१८५७ की क्रांति] को अंग्रेज इतिहासकारों ने बार-बार 'गदर'कहा है। चूँकि अंग्रेजों ने १८५७ की क्रांति को कुचलने में सफलता प्राप्त की थी ,इसलिए उन्होंने उसका खूब मजाक भी उड़ाया है। तत्कालीन ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रबंधकों का कहना था कि इस गदर में वे लोग मारे गए जो राजे -रजवाड़ों से वेतन पाते थे! खंड खंड बिखरे भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांस देशी राजे रजवाड़े ग्वालियर के सिंधिया और हैदराबाद के निजाम की तरह, अंग्रेजों से दोस्ती करके आपने-अपने राज्यों को बचाना चाहते थे। किसी को अपना हैदराबाद प्यारा था ,किसी को भोपाल प्यारा था ,किसी को लखनऊ -अवध प्यारा था ,किसी को इंदौर,पूना ,नागपुर, कानपुर,तंजावुर,मैसूर,बेंगलोर लाहौर रावलपिंडी और कष्मीर प्यारा था। तब किसी का कहना था कि ''मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी'' !गोकि यह किसी ने नहीं कहा कि मुझे मेरा 'भारत' चाहिए !केवल 'तात्याटोपे', चाफेकर बंधू और बंगाल के कुछ 'साधु संत' एवं 'बाघा जतीन' जैसे जननायक क्रांतिकारी अवश्य 'भारतराष्ट्' की स्वाधीनता का सपना देख रहे थे। मुझे ताज्जुब है कि इस सचाई को स्वीकार नहीं करने का सबब क्या है। अंग्रेज कहते रहे कि 'हिन्दुस्तान की आजादी' से १८५७ के विद्रोह का कुछ लेना देना नहीं है । जबकि तत्कालीन महान दार्शनिक और विचारक कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक 'भारतकी १८५७ की जनक्रांति' नामक दस्तावेज में यह सिद्ध किया है कि वह गदर नहीं बल्कि आजादी की महान 'जनक्रांति' ही थी ! मई -जून १८५७ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत के देशी सामंतों के विद्रोह को कुचल दिया था। वे तो पहले से ही देशी राजाओं को आपस में लड़ाकर उनके राज्य हथिया रहे थे। जब हमारे धार्मिक मजहबी -पंडित और मुल्ला मौलवी केवल धर्म-कर्म के साहित्य सृजन में जुटे हुए थे तब कार्ल मार्क्स लंदन में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को ललकार रहे थे। वे अंगेजों के दमन अत्याचार के खिलाफ दनादन लिख रहे थे। कार्ल मार्क्स के लेखन और आलोचना से प्रभावित होकर तत्कालीन 'महारानी विक्टोरिया' ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से भारत के तमाम विजित इलाके 'टेकओवर' कर लिए !और महारानी विक्टोरिया भारत साम्राज्ञी घोषित की गयीं ! भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम पर कई मत हो सकते हैं। किन्तु इस परमसत्य पर केवल एक ही मत हो सकता है ,कि आजाद और अखंड भारत का सपना देखने वाला पहला व्यक्ति 'तांत्या टोपे' ही था ! उनके जयंती पर शत शत नमन !क्रांतिकारी अभिवादन !श्रीराम तिवारी !
सोमवार, 17 अप्रैल 2017
'तांत्या टोपे'
भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम [१८५७ की क्रांति] को अंग्रेज इतिहासकारों ने बार-बार 'गदर'कहा है। चूँकि अंग्रेजों ने १८५७ की क्रांति को कुचलने में सफलता प्राप्त की थी ,इसलिए उन्होंने उसका खूब मजाक भी उड़ाया है। तत्कालीन ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रबंधकों का कहना था कि इस गदर में वे लोग मारे गए जो राजे -रजवाड़ों से वेतन पाते थे! खंड खंड बिखरे भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांस देशी राजे रजवाड़े ग्वालियर के सिंधिया और हैदराबाद के निजाम की तरह, अंग्रेजों से दोस्ती करके आपने-अपने राज्यों को बचाना चाहते थे। किसी को अपना हैदराबाद प्यारा था ,किसी को भोपाल प्यारा था ,किसी को लखनऊ -अवध प्यारा था ,किसी को इंदौर,पूना ,नागपुर, कानपुर,तंजावुर,मैसूर,बेंगलोर लाहौर रावलपिंडी और कष्मीर प्यारा था। तब किसी का कहना था कि ''मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी'' !गोकि यह किसी ने नहीं कहा कि मुझे मेरा 'भारत' चाहिए !केवल 'तात्याटोपे', चाफेकर बंधू और बंगाल के कुछ 'साधु संत' एवं 'बाघा जतीन' जैसे जननायक क्रांतिकारी अवश्य 'भारतराष्ट्' की स्वाधीनता का सपना देख रहे थे। मुझे ताज्जुब है कि इस सचाई को स्वीकार नहीं करने का सबब क्या है। अंग्रेज कहते रहे कि 'हिन्दुस्तान की आजादी' से १८५७ के विद्रोह का कुछ लेना देना नहीं है । जबकि तत्कालीन महान दार्शनिक और विचारक कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक 'भारतकी १८५७ की जनक्रांति' नामक दस्तावेज में यह सिद्ध किया है कि वह गदर नहीं बल्कि आजादी की महान 'जनक्रांति' ही थी ! मई -जून १८५७ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत के देशी सामंतों के विद्रोह को कुचल दिया था। वे तो पहले से ही देशी राजाओं को आपस में लड़ाकर उनके राज्य हथिया रहे थे। जब हमारे धार्मिक मजहबी -पंडित और मुल्ला मौलवी केवल धर्म-कर्म के साहित्य सृजन में जुटे हुए थे तब कार्ल मार्क्स लंदन में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को ललकार रहे थे। वे अंगेजों के दमन अत्याचार के खिलाफ दनादन लिख रहे थे। कार्ल मार्क्स के लेखन और आलोचना से प्रभावित होकर तत्कालीन 'महारानी विक्टोरिया' ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से भारत के तमाम विजित इलाके 'टेकओवर' कर लिए !और महारानी विक्टोरिया भारत साम्राज्ञी घोषित की गयीं ! भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम पर कई मत हो सकते हैं। किन्तु इस परमसत्य पर केवल एक ही मत हो सकता है ,कि आजाद और अखंड भारत का सपना देखने वाला पहला व्यक्ति 'तांत्या टोपे' ही था ! उनके जयंती पर शत शत नमन !क्रांतिकारी अभिवादन !श्रीराम तिवारी !
सोमवार, 10 अप्रैल 2017
भारत के अधिकाँस दलों और नेताओं का रवैया 'अभारतीय' है।
ऑस्ट्रलिया के प्रधान मंत्री मेल्कम टर्नबुल इंडिया आये। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने उनके साथ मेट्रो में सफर किया ,'अक्षर धाम मंदिर' ले गए , देवदर्शन कराये,उनके साथ नौका विहार बिहार किया ,क्रिकेट पर चर्चा की और सेल्फी भी ली !मेरे मन में सवाल उठा कि यदि लालू यादव मुख्य मंत्री होते तो क्या करते ? अवचेतन मन का जबाब था -करते क्या ?अपनी भैंसों के तबेले में ले जाते गोबर दिखलाते ,चारे पर चर्चा करते, मेल्कम टर्नबुल को सत्तू और लीची खिलाते और खुद तम्बाखू फांकते !यदि मुलायमसिंह यादव पीएम होते तो क्या करते ? जबाब हाजिर था -सैफई में मुजरा आयोजित कराते , थर्ड ग्रेट - फूहड़ डांस दिखलाते, आगरे का पेठा और मथुरा के पेढ़े खिलाते लोहियाके समाजवाद पर चर्चा करते ! यदि राहुल गाँधी पीएम होते तो क्या करते ? गाँधीजी , नेहरूजी ,इंदिराजी ,शाश्त्रीजी की समाधियों के दर्शन करानेके लिए विभिन्न घाटों पर ले जाते, सभी धर्म-मजहब-पंथ के धर्मगुरुओं सहित आस्ट्रेलिया के पीएम से 'सर्वधर्म प्रार्थना'एवं 'वैष्णव जन तो तेने कहिये जे जाने पीर पराई रे' वाला भजन गाते और निर्यात घाटे पर चर्चा करते ! यदि बहिन मायावती पीएम होती तो वे आस्ट्रेलिया के पीएम को लखनऊ ले जाकर काशीराम की प्रतिमाएं दिखातीं,पत्थरों के बड़े-बड़े हाथियों समेत खुद की विशाल प्रतिमाएँ दिखातीं , चलन से बाहर हो चुके नोटों की माला पहनातीं और ईवीएम मशीन पर चर्चा करतीं !यदि कोई वामपंथी व्यक्ति प्रधानमंत्री होता तो आस्ट्रेलिया के पीएम को भरी दुपहरी में रामलीला मैदान पर अथवा ईडन गार्डन ली जाता वहाँ दस-बीस लाख भूंखे- प्यासे किसान -मजदूरों को भाषण सुनवाता ! जैसा नेल्सन मंडेला के आगमन पर कोलकाता में हुआ था। एक तरह से भारत के अधिकाँस दलों और नेताओं का रवैया 'अभारतीय' है। किसी भारतीय प्रधानमंत्री की सोच तथा कार्यशैली वियतनाम के महान नेता 'हो -चिन्ह- मिन्ह' जैसी हो तो कोई बात बने ! वरना नीरस उबाऊ भाषण सुन सुनकर हैरान परेशांन सर्वहारावर्ग को साम्प्रदायिक बाड़े में घुसने से कोई नहीं रोक सकता !
रविवार, 9 अप्रैल 2017
क्या भाजपा और पीडीपी ने कश्मीर को और डूबा दिया ?
यह सुविदित है कि भारत एक महान लोकतान्त्रिक राष्ट्र है। इसीलिये भारतीय संविधान के निर्देशानुसार आतंकवाद और अलगाववाद की महामारी से पीड़ित जम्मू -कश्मीर में श्रीनगर लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव कराये गए। भयावह सूचना है कि सिर्फ ६.५% वोटिंग हुई है। कोई भी साधारण बुद्धि का इंसान यह समझ सकता है कि यह केंद्र सरकार और राज्य सरकार की कार्यनीतिक असफलता है और अपने ही राष्ट्र के प्रति उनका यह अक्षम्य अपराध भी है।अर्थात यह सत्ताधारी वर्ग द्वारा किया गया 'राष्ट्रद्रोह' है। क्या तथाकथित देशभक्त लोग और सत्ता के पिछलग्गू नर नारी इस अपराध के लिए मोदीजी या मेहबूबा मुफ्ती से ठोस सवाल करेंगे ? क्या वे कांग्रेस,वामपंथ और धर्म निरपेक्ष लोकतान्त्रिक विपक्षी दलों से उम्मीद करेंगे कि वे देश संभालें और साथ में कश्मीर भी संभालें?
यदि मोदी सरकार और मेहबूबा सरकार द्वारा यह बहाना पेश किया जाता है कि श्रीनगर के लोग, दहशतगर्दों की धमकियों से डरकर वोट डालने नहीं निकले तो यह किसकी विफलता है ? डॉ मनमोहनसिंह जब पीएम थे ,अटलबिहारी बाजपेई जब पीएम थे ,नरसिम्हाराव ,राजीव गांधी,इंदिराजी,नेहरू जब पीएम थे और जब फारुख अब्दुल्ला या उमर अब्दुला मुख्यमंत्री हुआ करते थे तब भी कश्मीर में पाक प्रेरित आतंक विद्यमान था। तब भी कश्मीरी लोग आतंक के साये में जी रहे थे,लेकिन इतना कम वोटिंग[5.6%]कभी नहीं हुआ। आम तौर पर कश्मीर में ५०% से कम वोटिंग कभी नहीं हुआ। अब यदि बाकई अच्छे दिन आये हैं,तो ज्यादा प्रतिशत से,ज्यादा हर्षोंल्लास से, वोटिंग होना चाहिए था !
नोटबंदी के पक्ष में दलील दी जाती रही है कि इससे आतंकवाद के वित्तपोषण का नाभिनाल काट दिया गया है। लेकिन जम्मू और कश्मीर में साम्प्रदायिक अलगाववादी तथा बस्तर इत्यादि में नक्सल आतंकवाद की स्थिति पहले से बदतर है। कल्पना कीजिये कि डॉ मनमोहनसिंह या राहुल गाँधी या कोई और बंदा भारत का प्रधान मंत्री होता , यह भी मान लीजिये कि भाजपा विपक्ष में होती ! तब यदि कोई कष्मीरी अलगाववादी-बदमाश पथ्थरबाज भारतीय सैनिकों का अपमान करता ,उन्हें थप्पड़ मारता ,उन्हें जूता सुंघाता ,तब भाजपा एवं संघ परिवार वालों की क्या प्रतिक्रिया होती ? तब स्मृति ईरानी हरी-हरी चूड़ियां लेकर राहुल गाँधी या मनमोहनसिंह को पहनाने के लिए लालायित होतीं और तब मोदी जी का सीना भी ५६ इंच का होता ! अभी अभी चंद रोज पहले जब कश्मीर में सीआरपीएफ के जवानों का अपमान हुआ तब किसी 'सत्ताभक्त' का सीना इस लायक नहीं दिखाकि मीडिआ में मुँह भी दिखा सकें ! कुछलोग जो आर्मी के इस अपमान से आहत हैं ,वे सेना के टेंक के आगे किसी अलगाववादी को घिसटते देख बड़ा आत्मसंतोष अनुभव कर रहे हैं ! कुछलोग कष्मीरी पत्थरबाजों के अनैतिक और देशद्रोह पूर्ण आचरण की तुलना जाट आरक्षण आंदोलन कारियों और पटेल आंदोलन कारियों द्वारा की गयी पुलिस की पिटाई से कर रहे हैं।कुछ लोग मुंबई सहित देश भर में फैले 'अंडर वर्ल्ड' द्वारा पुलिस की बेइज्जती से तुलना कर रहे हैं। लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि जहाँ -जहाँ संघ की ताकत बड़ी है वहाँ -वहां पुलिस का आत्मसमान नदारद है। बल्कि लगता है कि संविधान ही 'निलंबित ' है।
सारा संसार जानता है कि कष्मीरी पत्थरबाजों के हाथों पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ परोक्ष युद्ध छेड़ रखा है !दुनिया का जो व्यक्ति इस सिद्धांत को नहीं मानता वह भारत का मित्र नहीं हो सकता। कश्मीर घाटी में आईएसआईएस और पाकिस्तान की पकड़ इतनी मजबूत है कि फारुख अब्दुल्ला और उनका बेटा उमर अब्दुला भी अलगाववादियों के पैरोकार बने हुए हैं। भाजपा के सहयोग से कष्मीर पर राज कर रही मेहबूबा मुफ्ती भी अलगाववादियों के बजाय भारतीय सेना की ही आलोचना किये जा रही है। कश्मीर में लगातार भारतीय सैनिकों को अपमानित किये जाने के बाद भारतकी जनताने और सेनाने जो धैर्य दिखायाहै वो कबीले तारीफ है। सेना के लिए इजरायल में दस्तूर है कि कोई यदि एक इजरायली सैनिक को मार दे तो बदले में सौ दुश्मन तत्काल मारे जायेंगे!इंग्लैंड रूस, अमेरिका,जापान और चीन में सेनाको बेहतर सम्मान प्राप्त है ,जबकि भारतीय सेना को हमेशा 'अहिंसा परमोधर्म:' के अनुसार चलना पडता है।भारतीय फौज को बाढ़ में मदद के बदले ,अलगाववादी लफंगों के थप्पड़ खाने पड़ रहे हैं। इसके वावजूद कुछ लोग सोशल मीडिया पर लगातार सरकार की आलोचना के बहाने भारतीय सेना को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं यह वतन के साथ सरासर गद्दारी ही। जोलोग कश्मीरकी असल तासीर से वाकिफ नहीं और भारतीय सेनाकी ओर अंगुली नहीं उठा रहे हैं वे मेरी नज़र में परवेज मुसर्रफ और हाफिज सईद के ! लोग अलगाववादियों के पैरोकार हैं वे ज्यादा
भारतीय सेना को बदनाम करने वाला शख्स भारत का मित्र नहीं हो सकता।
जबसे स्वयंभू राष्ट्रवादी लोग देश की सत्ता में आये हैं, कश्मीर की घाटी में घोर अशांति है। यह शैतान की छाया है। या 'राष्ट्रवाद' की माया है ? किस मुँह से कहते फिरते हैं बड़बोले लोग कि ७० साल में कष्मीर में अमन के लिए कुछ नहीं किया गया ?अरे मूर्खो पहले कष्मीरी पत्थरबाजों से तो पूंछो वे अमन चाहते भी हैं, या वे भी पाकिस्तानी आतंकियों की तरह आईएसआईएस की नाजायज औलाद कहलाना चाहते हैं। बड़ी डींगे हांकीं गयीं कि अब असली 'देशभक़्त लोग सत्ता में आ गए हैं तो सब कुछ ठीक कर देंगे ? क्या आपके बदलाव का आशय यही है कि पहले तो केवल कुछ दस बीस अलगाववादी ही पत्थरबाजी किया करते थे ,लेकिन अब अधिकांश कश्मीरी जवान औरतों और कालेज की छात्राओं को भी पत्थरबाजी का चस्का लग चुका है !
सिर्फ कश्मीर ही नहीं, बस्तर ही नहीं बल्कि सारे मुल्क में इन दिनों अंधेरगर्दी का साम्राज्य पसरा हुआ है। दुष्मनी के सिवा अब हमारा पाकिस्तान और चीन से शायद कोई संबंध नहीं रह गया है। चीन ने भारतीय प्रान्त अरुणाचल के शहरों के नाम तक बदल डाले हैं। कष्मीर के अधिकाँस पुलिस थाने बंद हो चुके हैं। बस्तर -सुकमा में भारतीय सीआरपीएफ के जवान मौत के घाट उतारे जा रहे हैं। लेकिन भाजपा और मोदी जी को शायद कोई खास चिंता नहीं है। उन्हें तो बस केवल कांग्रेस मुक्त भारत चाहिए ! वे नहीं जानते कि क्या वजह है कि कष्मीर में कम वोटिंग क्यों हुआ ? जबकि सभी जानते हैं कि श्रीनगर में अभी जब दुबारा वोटिंग हुई तब भी लोग घरों से नहीं निकले ! क्या जम्मू कष्मीर की इतनी बुरी हालत पहले कभी थी ?डॉ मनमोहन सिंह या उनसे पहले के पीएम और कष्मीर के सीएम उमर अब्दुला भी इतने नाकारा नहीं थे ! कश्मीर की मुख्यमंत्री महोदया आदरणीय मेहबूबा मुफ्तीजी, पहले आप बजा फरमाएं कि आपने कष्मीर की सत्तामें आकर क्या किया ? मोदीजी और भाजपा नेता बताएं की उन्होंने और पीडीपी ने कश्मीर और भारत देश को ऐंसा क्या दिया जो पहले और किसी ने नहीं दिया ? यदि आप के पास जबाब नहीं तो नोट कीजियेगा मैं बताता हूँ ! भारत की आजादी के बाद कश्मीर में ऐंसा पहली बार हुआ है कि भारतीय सेनाको जूते चप्पलों से पीटा गया !कश्मीर में ऐंसा पहली बार हो रहा है कि जवान लडकियां भी पत्थरबाजी कर रही हैं ! ऐंसा पहली बार हो रहा है कि नोटबंदी के वावजूद उधर हरेक के पास नए नोट इफरात में हैं !ऐंसा तब हो रहा है जब केंद्र मेंअब तक के 'सबसे लोकप्रिय' प्रधान मंत्री हैं और कष्मीर में उनके सहयोग से मेहबूबा मुफ्ती की सरकार है !
सारा राष्ट्र सो रहा है !कोई नहीं पूंछ रहा है कि मोदी जी बस्तर में सीआरपीएफ के दर्जनों जवानों को बेमौत क्यों मरना पड़ा ?जब आपकी नोटबंदी सफल रही और आप हरजगह दनादन जीत भी रहे हैं तो ये बस्तर के नक्सली, धन कहाँसे प्राप्त करते हैं ?उनके पास आधुनिक हथियार क्यों हैं? वे सही सलामत क्यों हैं ?
अब कोई देशभक्त नहीं पूंछ रहा कि जब केंद्र में शानदार बहुमत वाली 'राष्ट्रवादियों'की सरकार है,तो कश्मीर में आग क्यों लगी है ? वर्तमान मोदी सरकार ने और मेहबूबा सरकार ने पहले की अपेक्षा ऐंसा क्या किया कि वो काबलेतारीफ हो ?असफल होकर इस्तीफे के बहाने खोजना और इस्तीफे की धमकी देना कोई तुक की बता नहीं है !
हालाँकि मेहबूबा मुफ्ती की यह स्तीफे वाली धमकी कुछ तो असर कर गयी ! तभी तो केंद्र सरकार और पीएम की रजामंदी से आनन् फानन पांच हजार पुलिस पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरूं की गयी। और जिन युवाओं के हाथों में भारतीय सेना और पुलिस के खिलाफ केवल पत्थर हुआ करते थे उनमें से हजारों युवा श्रीनगर के बख्सी स्टेडियम में टूट पड़े! इनमें से कुछ युवाओं का कहना है कि हमने पैसे के लिए ही पत्थर उठाये थे ,और अब पैसे के लिए ही पुलिसकी नौकरी भी स्वीकार है !
रविवार, 2 अप्रैल 2017
इससे पहले वाली पोस्ट में मैने भिंड [अटेर ] के उपचुनाव में ईवीम मशीन द्वारा केवल 'कमल निशाँन' दर्शाने बावत ध्यानाकर्षण किया था। अधिकान्स बुद्धिमान जागरूक साथियों ने इसे तकनीकी दोष माना और प्रथम दृष्ट्या यह सही भी लगता है। किन्तु दो-तीन सिरफिरों को मेरा ध्यानाकर्षण अच्छा नहीं लगा। उन्होंने मेरी तत्सम्बन्धी पोस्ट को भाजपा के खिलाफ दुष्प्रचार मानकर,अपने दिमाग का तमाम कूड़ा कचरा फेस बुक पर उड़ेल दिया। यदि मेरी पोस्ट निराधार या काल्पनिक है ,तो सेंट्रल इलेक्शन कमीशन ने उच्च स्तरीय जांच कमीशन गठित कर भिंड क्यों भेजा ? और यदि सिर्फ तकनीकी दोष ही था तो प्रारम्भ में इसे छिपाने की कोशिश क्यों की गई ? कुछ लोग जिन्हें राजनीति और समसामयिक घटनाओं का समुचित ज्ञान नहीं वे बिना मेरी पोस्ट को ठीक से पढ़े ही अंट-शंट लिखने लग जाते हैं ,उनका यह प्रमादपूर्ण आचरण लोकतंत्र के लिए खतरा है।
बचपन में किसी भारतीय संस्कृत वाङ्ग्मय में सुभाषित पढ़ा था ''यद्द्पि शुद्धम लोकविरुद्धम न कथनीयम ना कथनीयम '' अर्थात 'यद्द्पि आप नितान्त सच ही कहना चाहते हैं, किन्तु यदि वह सच 'लोकविरुद्ध' है तो मत कहो-मत कहो!' यद्द्पि श्री प्रशांत भूषण बहुत बड़े काबिल वकील हैं ,उनपर कोई भृष्टाचार का आरोप भी नहीं है। वे देश को भृष्टाचार मुक्त करना चाहते हैं ,वे हमेशा सत्ताधारियों के भृष्ट आचरण के खिलाफ रहे हैं। लेकिन उन्हें भारतीय जन मानस की श्रद्धा का ध्यान रखना चाहिए। हालांकि प्रशांत भूषण जी ने 'एंटी रोमियो' की जगह 'एंटी श्रीकृष्ण' का सुझाव देकर एक किस्म का तंज ही कसा है, किन्तु यह तंज उच्चकोटि के साहित्यकारों और व्याकरणवेत्ताओं के स्तर है । किन्तु भैंसों के आगे बीन बजाकर उन्होंने अच्छा नहीं किया। सांडों को सरेराह लाल कपडा दिखाकर प्रशांत भूषण क्या सिद्ध करना चाहते हैं? एकचालुकानुवर्तित्व वाले मंदमति भेड़ों रेवड़ों को यदि कोयल की कूंक में भी गर्दभवाणी सुनाई दे तो क्या कीजियेगा? सभी यह अच्छी तरह जानते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण के अलावा 'रासलीला' का कोई मतलब नहीं।श्रीकृष्ण के नामों में ही उनके रस सौंदर्य और पारलौकिक प्रेम की झनकार प्रतिध्वनित होती है। श्रीकृष्ण के नाम रूप गुण की प्रतीति के लिए आस्तिक जन उन्हें हजारों साल से -रसिकलाल,बांकेबिहारी , मनमोहन,छलिया,चितचोर ,गोपिकाभल्लभ [गोपियों का स्वामी या इन्द्रियों का स्वामी ] राधावल्लभ इत्यादि नामों से पुकारते चले आ रहे हैं। 'मोहे पनघट पै नन्दलाल छेड़ गयो रे ' गीत लिखने वाले गाने वाले तो संत महात्मा हो गए और विशुद्ध हिंदी में इसी का अनुवाद करने वाले प्रशांत भूषण के लिए चप्पल मारने के फतवे जारी किये जा रहे हैं। छि : धिक्कार है ऐंसे संकीर्णतावादियों को ! प्रशांतभूषण को भी समझना चाहिए कि 'समरथ कहूँ नहिं दोष गुसाईं ' ! वैसे भी अभी इस दौर में तो साम्प्रदायिक कड़ी में कुछ ज्यादा ही उबाल आया है। अभी सचबयानी पर पहरें हैं !अभी तो पुरजोर कोशिश यह होनी चाहिए कि 'सत्ता चापलूसी परमोधर्म : !
बचपन में किसी भारतीय संस्कृत वाङ्ग्मय में सुभाषित पढ़ा था ''यद्द्पि शुद्धम लोकविरुद्धम न कथनीयम ना कथनीयम '' अर्थात 'यद्द्पि आप नितान्त सच ही कहना चाहते हैं, किन्तु यदि वह सच 'लोकविरुद्ध' है तो मत कहो-मत कहो!' यद्द्पि श्री प्रशांत भूषण बहुत बड़े काबिल वकील हैं ,उनपर कोई भृष्टाचार का आरोप भी नहीं है। वे देश को भृष्टाचार मुक्त करना चाहते हैं ,वे हमेशा सत्ताधारियों के भृष्ट आचरण के खिलाफ रहे हैं। लेकिन उन्हें भारतीय जन मानस की श्रद्धा का ध्यान रखना चाहिए। हालांकि प्रशांत भूषण जी ने 'एंटी रोमियो' की जगह 'एंटी श्रीकृष्ण' का सुझाव देकर एक किस्म का तंज ही कसा है, किन्तु यह तंज उच्चकोटि के साहित्यकारों और व्याकरणवेत्ताओं के स्तर है । किन्तु भैंसों के आगे बीन बजाकर उन्होंने अच्छा नहीं किया। सांडों को सरेराह लाल कपडा दिखाकर प्रशांत भूषण क्या सिद्ध करना चाहते हैं? एकचालुकानुवर्तित्व वाले मंदमति भेड़ों रेवड़ों को यदि कोयल की कूंक में भी गर्दभवाणी सुनाई दे तो क्या कीजियेगा? सभी यह अच्छी तरह जानते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण के अलावा 'रासलीला' का कोई मतलब नहीं।श्रीकृष्ण के नामों में ही उनके रस सौंदर्य और पारलौकिक प्रेम की झनकार प्रतिध्वनित होती है। श्रीकृष्ण के नाम रूप गुण की प्रतीति के लिए आस्तिक जन उन्हें हजारों साल से -रसिकलाल,बांकेबिहारी , मनमोहन,छलिया,चितचोर ,गोपिकाभल्लभ [गोपियों का स्वामी या इन्द्रियों का स्वामी ] राधावल्लभ इत्यादि नामों से पुकारते चले आ रहे हैं। 'मोहे पनघट पै नन्दलाल छेड़ गयो रे ' गीत लिखने वाले गाने वाले तो संत महात्मा हो गए और विशुद्ध हिंदी में इसी का अनुवाद करने वाले प्रशांत भूषण के लिए चप्पल मारने के फतवे जारी किये जा रहे हैं। छि : धिक्कार है ऐंसे संकीर्णतावादियों को ! प्रशांतभूषण को भी समझना चाहिए कि 'समरथ कहूँ नहिं दोष गुसाईं ' ! वैसे भी अभी इस दौर में तो साम्प्रदायिक कड़ी में कुछ ज्यादा ही उबाल आया है। अभी सचबयानी पर पहरें हैं !अभी तो पुरजोर कोशिश यह होनी चाहिए कि 'सत्ता चापलूसी परमोधर्म : !
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