भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम [१८५७ की क्रांति] को अंग्रेज इतिहासकारों ने बार-बार 'गदर'कहा है। चूँकि अंग्रेजों ने १८५७ की क्रांति को कुचलने में सफलता प्राप्त की थी ,इसलिए उन्होंने उसका खूब मजाक भी उड़ाया है। तत्कालीन ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रबंधकों का कहना था कि इस गदर में वे लोग मारे गए जो राजे -रजवाड़ों से वेतन पाते थे! खंड खंड बिखरे भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांस देशी राजे रजवाड़े ग्वालियर के सिंधिया और हैदराबाद के निजाम की तरह, अंग्रेजों से दोस्ती करके आपने-अपने राज्यों को बचाना चाहते थे। किसी को अपना हैदराबाद प्यारा था ,किसी को भोपाल प्यारा था ,किसी को लखनऊ -अवध प्यारा था ,किसी को इंदौर,पूना ,नागपुर, कानपुर,तंजावुर,मैसूर,बेंगलोर लाहौर रावलपिंडी और कष्मीर प्यारा था। तब किसी का कहना था कि ''मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी'' !गोकि यह किसी ने नहीं कहा कि मुझे मेरा 'भारत' चाहिए !केवल 'तात्याटोपे', चाफेकर बंधू और बंगाल के कुछ 'साधु संत' एवं 'बाघा जतीन' जैसे जननायक क्रांतिकारी अवश्य 'भारतराष्ट्' की स्वाधीनता का सपना देख रहे थे। मुझे ताज्जुब है कि इस सचाई को स्वीकार नहीं करने का सबब क्या है। अंग्रेज कहते रहे कि 'हिन्दुस्तान की आजादी' से १८५७ के विद्रोह का कुछ लेना देना नहीं है । जबकि तत्कालीन महान दार्शनिक और विचारक कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक 'भारतकी १८५७ की जनक्रांति' नामक दस्तावेज में यह सिद्ध किया है कि वह गदर नहीं बल्कि आजादी की महान 'जनक्रांति' ही थी ! मई -जून १८५७ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत के देशी सामंतों के विद्रोह को कुचल दिया था। वे तो पहले से ही देशी राजाओं को आपस में लड़ाकर उनके राज्य हथिया रहे थे। जब हमारे धार्मिक मजहबी -पंडित और मुल्ला मौलवी केवल धर्म-कर्म के साहित्य सृजन में जुटे हुए थे तब कार्ल मार्क्स लंदन में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को ललकार रहे थे। वे अंगेजों के दमन अत्याचार के खिलाफ दनादन लिख रहे थे। कार्ल मार्क्स के लेखन और आलोचना से प्रभावित होकर तत्कालीन 'महारानी विक्टोरिया' ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से भारत के तमाम विजित इलाके 'टेकओवर' कर लिए !और महारानी विक्टोरिया भारत साम्राज्ञी घोषित की गयीं ! भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम पर कई मत हो सकते हैं। किन्तु इस परमसत्य पर केवल एक ही मत हो सकता है ,कि आजाद और अखंड भारत का सपना देखने वाला पहला व्यक्ति 'तांत्या टोपे' ही था ! उनके जयंती पर शत शत नमन !क्रांतिकारी अभिवादन !श्रीराम तिवारी !
सोमवार, 17 अप्रैल 2017
'तांत्या टोपे'
भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम [१८५७ की क्रांति] को अंग्रेज इतिहासकारों ने बार-बार 'गदर'कहा है। चूँकि अंग्रेजों ने १८५७ की क्रांति को कुचलने में सफलता प्राप्त की थी ,इसलिए उन्होंने उसका खूब मजाक भी उड़ाया है। तत्कालीन ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रबंधकों का कहना था कि इस गदर में वे लोग मारे गए जो राजे -रजवाड़ों से वेतन पाते थे! खंड खंड बिखरे भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांस देशी राजे रजवाड़े ग्वालियर के सिंधिया और हैदराबाद के निजाम की तरह, अंग्रेजों से दोस्ती करके आपने-अपने राज्यों को बचाना चाहते थे। किसी को अपना हैदराबाद प्यारा था ,किसी को भोपाल प्यारा था ,किसी को लखनऊ -अवध प्यारा था ,किसी को इंदौर,पूना ,नागपुर, कानपुर,तंजावुर,मैसूर,बेंगलोर लाहौर रावलपिंडी और कष्मीर प्यारा था। तब किसी का कहना था कि ''मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी'' !गोकि यह किसी ने नहीं कहा कि मुझे मेरा 'भारत' चाहिए !केवल 'तात्याटोपे', चाफेकर बंधू और बंगाल के कुछ 'साधु संत' एवं 'बाघा जतीन' जैसे जननायक क्रांतिकारी अवश्य 'भारतराष्ट्' की स्वाधीनता का सपना देख रहे थे। मुझे ताज्जुब है कि इस सचाई को स्वीकार नहीं करने का सबब क्या है। अंग्रेज कहते रहे कि 'हिन्दुस्तान की आजादी' से १८५७ के विद्रोह का कुछ लेना देना नहीं है । जबकि तत्कालीन महान दार्शनिक और विचारक कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक 'भारतकी १८५७ की जनक्रांति' नामक दस्तावेज में यह सिद्ध किया है कि वह गदर नहीं बल्कि आजादी की महान 'जनक्रांति' ही थी ! मई -जून १८५७ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत के देशी सामंतों के विद्रोह को कुचल दिया था। वे तो पहले से ही देशी राजाओं को आपस में लड़ाकर उनके राज्य हथिया रहे थे। जब हमारे धार्मिक मजहबी -पंडित और मुल्ला मौलवी केवल धर्म-कर्म के साहित्य सृजन में जुटे हुए थे तब कार्ल मार्क्स लंदन में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को ललकार रहे थे। वे अंगेजों के दमन अत्याचार के खिलाफ दनादन लिख रहे थे। कार्ल मार्क्स के लेखन और आलोचना से प्रभावित होकर तत्कालीन 'महारानी विक्टोरिया' ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से भारत के तमाम विजित इलाके 'टेकओवर' कर लिए !और महारानी विक्टोरिया भारत साम्राज्ञी घोषित की गयीं ! भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम पर कई मत हो सकते हैं। किन्तु इस परमसत्य पर केवल एक ही मत हो सकता है ,कि आजाद और अखंड भारत का सपना देखने वाला पहला व्यक्ति 'तांत्या टोपे' ही था ! उनके जयंती पर शत शत नमन !क्रांतिकारी अभिवादन !श्रीराम तिवारी !
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