इससे पहले वाली पोस्ट में मैने भिंड [अटेर ] के उपचुनाव में ईवीम मशीन द्वारा केवल 'कमल निशाँन' दर्शाने बावत ध्यानाकर्षण किया था। अधिकान्स बुद्धिमान जागरूक साथियों ने इसे तकनीकी दोष माना और प्रथम दृष्ट्या यह सही भी लगता है। किन्तु दो-तीन सिरफिरों को मेरा ध्यानाकर्षण अच्छा नहीं लगा। उन्होंने मेरी तत्सम्बन्धी पोस्ट को भाजपा के खिलाफ दुष्प्रचार मानकर,अपने दिमाग का तमाम कूड़ा कचरा फेस बुक पर उड़ेल दिया। यदि मेरी पोस्ट निराधार या काल्पनिक है ,तो सेंट्रल इलेक्शन कमीशन ने उच्च स्तरीय जांच कमीशन गठित कर भिंड क्यों भेजा ? और यदि सिर्फ तकनीकी दोष ही था तो प्रारम्भ में इसे छिपाने की कोशिश क्यों की गई ? कुछ लोग जिन्हें राजनीति और समसामयिक घटनाओं का समुचित ज्ञान नहीं वे बिना मेरी पोस्ट को ठीक से पढ़े ही अंट-शंट लिखने लग जाते हैं ,उनका यह प्रमादपूर्ण आचरण लोकतंत्र के लिए खतरा है।
बचपन में किसी भारतीय संस्कृत वाङ्ग्मय में सुभाषित पढ़ा था ''यद्द्पि शुद्धम लोकविरुद्धम न कथनीयम ना कथनीयम '' अर्थात 'यद्द्पि आप नितान्त सच ही कहना चाहते हैं, किन्तु यदि वह सच 'लोकविरुद्ध' है तो मत कहो-मत कहो!' यद्द्पि श्री प्रशांत भूषण बहुत बड़े काबिल वकील हैं ,उनपर कोई भृष्टाचार का आरोप भी नहीं है। वे देश को भृष्टाचार मुक्त करना चाहते हैं ,वे हमेशा सत्ताधारियों के भृष्ट आचरण के खिलाफ रहे हैं। लेकिन उन्हें भारतीय जन मानस की श्रद्धा का ध्यान रखना चाहिए। हालांकि प्रशांत भूषण जी ने 'एंटी रोमियो' की जगह 'एंटी श्रीकृष्ण' का सुझाव देकर एक किस्म का तंज ही कसा है, किन्तु यह तंज उच्चकोटि के साहित्यकारों और व्याकरणवेत्ताओं के स्तर है । किन्तु भैंसों के आगे बीन बजाकर उन्होंने अच्छा नहीं किया। सांडों को सरेराह लाल कपडा दिखाकर प्रशांत भूषण क्या सिद्ध करना चाहते हैं? एकचालुकानुवर्तित्व वाले मंदमति भेड़ों रेवड़ों को यदि कोयल की कूंक में भी गर्दभवाणी सुनाई दे तो क्या कीजियेगा? सभी यह अच्छी तरह जानते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण के अलावा 'रासलीला' का कोई मतलब नहीं।श्रीकृष्ण के नामों में ही उनके रस सौंदर्य और पारलौकिक प्रेम की झनकार प्रतिध्वनित होती है। श्रीकृष्ण के नाम रूप गुण की प्रतीति के लिए आस्तिक जन उन्हें हजारों साल से -रसिकलाल,बांकेबिहारी , मनमोहन,छलिया,चितचोर ,गोपिकाभल्लभ [गोपियों का स्वामी या इन्द्रियों का स्वामी ] राधावल्लभ इत्यादि नामों से पुकारते चले आ रहे हैं। 'मोहे पनघट पै नन्दलाल छेड़ गयो रे ' गीत लिखने वाले गाने वाले तो संत महात्मा हो गए और विशुद्ध हिंदी में इसी का अनुवाद करने वाले प्रशांत भूषण के लिए चप्पल मारने के फतवे जारी किये जा रहे हैं। छि : धिक्कार है ऐंसे संकीर्णतावादियों को ! प्रशांतभूषण को भी समझना चाहिए कि 'समरथ कहूँ नहिं दोष गुसाईं ' ! वैसे भी अभी इस दौर में तो साम्प्रदायिक कड़ी में कुछ ज्यादा ही उबाल आया है। अभी सचबयानी पर पहरें हैं !अभी तो पुरजोर कोशिश यह होनी चाहिए कि 'सत्ता चापलूसी परमोधर्म : !
बचपन में किसी भारतीय संस्कृत वाङ्ग्मय में सुभाषित पढ़ा था ''यद्द्पि शुद्धम लोकविरुद्धम न कथनीयम ना कथनीयम '' अर्थात 'यद्द्पि आप नितान्त सच ही कहना चाहते हैं, किन्तु यदि वह सच 'लोकविरुद्ध' है तो मत कहो-मत कहो!' यद्द्पि श्री प्रशांत भूषण बहुत बड़े काबिल वकील हैं ,उनपर कोई भृष्टाचार का आरोप भी नहीं है। वे देश को भृष्टाचार मुक्त करना चाहते हैं ,वे हमेशा सत्ताधारियों के भृष्ट आचरण के खिलाफ रहे हैं। लेकिन उन्हें भारतीय जन मानस की श्रद्धा का ध्यान रखना चाहिए। हालांकि प्रशांत भूषण जी ने 'एंटी रोमियो' की जगह 'एंटी श्रीकृष्ण' का सुझाव देकर एक किस्म का तंज ही कसा है, किन्तु यह तंज उच्चकोटि के साहित्यकारों और व्याकरणवेत्ताओं के स्तर है । किन्तु भैंसों के आगे बीन बजाकर उन्होंने अच्छा नहीं किया। सांडों को सरेराह लाल कपडा दिखाकर प्रशांत भूषण क्या सिद्ध करना चाहते हैं? एकचालुकानुवर्तित्व वाले मंदमति भेड़ों रेवड़ों को यदि कोयल की कूंक में भी गर्दभवाणी सुनाई दे तो क्या कीजियेगा? सभी यह अच्छी तरह जानते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण के अलावा 'रासलीला' का कोई मतलब नहीं।श्रीकृष्ण के नामों में ही उनके रस सौंदर्य और पारलौकिक प्रेम की झनकार प्रतिध्वनित होती है। श्रीकृष्ण के नाम रूप गुण की प्रतीति के लिए आस्तिक जन उन्हें हजारों साल से -रसिकलाल,बांकेबिहारी , मनमोहन,छलिया,चितचोर ,गोपिकाभल्लभ [गोपियों का स्वामी या इन्द्रियों का स्वामी ] राधावल्लभ इत्यादि नामों से पुकारते चले आ रहे हैं। 'मोहे पनघट पै नन्दलाल छेड़ गयो रे ' गीत लिखने वाले गाने वाले तो संत महात्मा हो गए और विशुद्ध हिंदी में इसी का अनुवाद करने वाले प्रशांत भूषण के लिए चप्पल मारने के फतवे जारी किये जा रहे हैं। छि : धिक्कार है ऐंसे संकीर्णतावादियों को ! प्रशांतभूषण को भी समझना चाहिए कि 'समरथ कहूँ नहिं दोष गुसाईं ' ! वैसे भी अभी इस दौर में तो साम्प्रदायिक कड़ी में कुछ ज्यादा ही उबाल आया है। अभी सचबयानी पर पहरें हैं !अभी तो पुरजोर कोशिश यह होनी चाहिए कि 'सत्ता चापलूसी परमोधर्म : !

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