मंगलवार, 15 नवंबर 2016

दोनों सर्जिकल स्ट्राइक टॉय -टॉय फ़िस्स हो गयीं हैं!


किसी भी लोकतान्त्रिक देश की  निर्वाचित सरकार का यह उत्तरदायित्व है कि वह देश की सीमाओं की सुरक्षा के  बाजिब इंतजाम करे। इसके लिए मजबूत - चौकस सैन्यबल एवम उसके लिए पार्यप्त आधुनिकतम अश्त्र -  शस्त्र उपलब्ध कराना सरकार का परम कर्तव्य है। लेकिन वर्तमान मोदी सरकार ने इस बाबत कोई क्रांतिकारी कदम नहीं उठाया। बल्कि पाकिस्तान परस्त आतंकवाद और भारत के खिलाफ उसके परोक्ष युद्ध का जबाब 'पीओके'में 'आपरेशन सैन्य सर्जिकल स्ट्राइक' से देकर 'आग में घी डालने' का काम किया । उन्होंने पीओके में सैन्य सर्जिकल स्ट्राइक का ढिंढोरा पीटकर देशकी आवाम को यह जताने की फूहड़ कोशिश की , कि ''आइंदा आतंकवादी और पाकिस्तान अपनी औकात में रहेंगे। क्योंकि हमने 'पहली बार' सीमापार कर दुश्मन के घर में घुसकर, पाक-समर्थित आतंकवाद  का सफाया किया है।''लेकिन सारा संसार देख रहा है कि तथाकथित 'सैन्य सर्जिकल स्ट्राइक' के बाद से सीमा पर भारतीय जवान अधिक तादाद में शहीद हो रहे हैं ! फर्क सिर्फ इतना ही आया है कि पहले पाकिस्तानी हमलावर  कुछ कम मरते थे ,लेकिन अब दोनों ओर ज्यादा मरने लगे हैं। चूँकि मोदी सरकार के सत्ता में आने और सर्जिकल इत्यादि का टोटका करने से न तो आतंकवाद खत्म हुआ और न ही पाकिस्तान काबू में आया। कश्मीर की दुर्दशा तो पहले से ज्यादा भयानक हो गयी है। यदि कोई यह सच बयान करे तो उसे देशद्रोह का तमगा हाजिर है।

ढाई साल बीत जाने के बाद जब मोदी सरकार को कालेधन और आतंकवाद पर कोई सफलता नहीं मिली तो उन्होंने 'घर में छिपे साँप को मारने के लिए घर में ही आग लगा दी'। ७-८ नवम्बर की दरम्यानी रात को उन्होंने १०००-५०० के नोटों पर बंदिश लगाकर ढिंढोरा पीट डाला कि 'भाइयो-बहिनो' देखो - हमने ''आपरेशन मौद्रिक
सर्जिकल स्ट्राइक करके हमने कालेधन वालों की ,रिश्वतखोरों की और आतंकियों का सारा धन जब्त कर लिया है !''जबकि हकीकत सामने है कि सरकार के खजाने में एक फूटी कौड़ी नहीं आयी है। बैंकों के पास अबतक जो दो लाख करोड़ रूपया जमा हुआ है वह ९९% नंबर एक की असली मुद्रा के रूप में विनिमय से प्राप्त पुरानी मुद्रा  ही है, उसमें सिर्फ १% कालाधन हो सकता है। बाकी का १२ लाख करोड़ का कालाधन कहाँ है ? मोदी सरकार की दोनों सर्जिकल स्ट्राइक टॉय -टॉय फ़िस्स हो गयीं हैं !

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016


समय ,स्पेस ,स्थिति ,चेतना और जिजीविषा का भाव -इन पांच 'तत्वों' के बिना मनुष्य और उसके द्वारा संकल्पित या रचित संसार का कोई अस्तित्व नहीं ! श्रीराम तिवारी

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

सावधान रक्तबीज अभी भी जिन्दा है

विगत वर्ष जब पाक प्रशिक्षित आतंकियों ने पठानकोट आर्मीवेस पर आक्रमण किया था  तब 'हमारे' रक्षामंत्री श्री मनोहर पर्रिकर ने कहा था कि यह ''आखरी चूक होगी ,आइंदा हमारी अनुमति के बिना परिन्दा भी हमारी सीमा में प्रवेश नहीं कर सकेगा !''अभी -अभी की ताजा खबर है कि जम्मू कश्मीर के पम्पोर की ईडीआई बिल्डिंग में एक दर्जन से अधिक पाकिस्तानी आतंकी छिपकर  गोली बारी कर रहे हैं। जब आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक सफल हो गया और उस सफलता का रावण जल रहे हैं तो यह 'रक्तबीज' कहाँ से पैदा हो गया ? इसलिए हे भारत वासियो -सावधान रक्तबीज अभी भी जिन्दा है !

  १६-१७ सितम्बर की दरम्यानी रातको पाकिस्तानी फ़ौज की 'आतंकी' टुकड़ी ने जब कश्मीर के उड़ी सेक्टर में भारत के १८ जवानों को आर्मी वेस में सोते हुए मार डाला , तब भारत के सत्तारूढ़ नेताओंको और फ़ौजको बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ीथी । उन्हें भारतीय मीडिया और जनता ने बहुत धिक्कारा था !कुछ सरकार विरोधियों ने भी पाकिस्तान प्रेरित आतंकवादकी निंदा करनेके बजाय अपने ही सैन्यबलों के सामर्थ्य पर सवाल खड़े कर दिए थे। कुछ स्वयम्भू देशभक्तों और सरकार समर्थकों ने  भी इस कदर बेहद बेहयाई दिखाई की जगह-जगह 'आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक ' के पोस्टर लगा दिए, जबकि उस कार्यवाही के बारे में अभी तक हमारी सरकार ने तत्सम्बन्धी तथ्य उजगार  करने का फैसला ही नहीं लिया है।

लखनऊ में रामलीला मैदान के बाहर जो पोस्टर लगे हैं ,उनमें लिखा है की ''उड़ी का बदला लेने वाले महाबली का हार्दिक स्वागत है '' जिनका स्वागत किया  उनमें पीएम हैं ,भाजपा के नेता हैं ,किन्तु फ़ौज का नाम कहीं भी नहीं है। जबकि हमारी  फ़ौज इस वक्त पंपोर में आतंकवादियों से युद्ध कर रही है ,हमारे दर्जनों सैनिक घायल हो चुके हैं और न जाने  कितने शहीद हो रहे हैं  यह कोई बताने को  कोई तैयार नहीं है।  जो लोग  दशहरे के त्यौहार में भी राजनीति कर रहे हैं वे इस अवसर पर अपने उन शहीदों को भी याद रखें जो इस वक्त अपनपोर में अपने प्राण न्योछावर कर रहे हैं। और यह भी याद रखें कि -जरा याद करो कुर्बानी !आपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता पर डींगे मारने वालों जरा पंपोर की ओर देखो वहाँ तुम्हें तुम्हारे पाखण्ड का धुआँ ही  नजर आएगा!

क्या इस बार भी सरकारकी असफलता और सुरक्षा बलों की गफलत का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ दिया जाएगा ? जब -जब पाकिस्तान की ओर से हमले हुए तब-तब जन दबाव में सरकार ने तत्काल कूटनीतिक इंतजाम किये। मोदी सरकार ने अमेरिका ,रूस ,ब्रिटेन ,फ़्रांस जर्मनी ,जापान सहित तमाम दुनिया के देशों को साधने का भरपूर प्रयास किया ।लेकिन ताजा खबर है कि यूएनओ सहित अधिकांस देशोंने भारत-पाक सीमाओंकी झड़पों, कश्मीर के मुद्दे को  द्विपक्षीय बताकर इस मामले में चुप्पी साध ली है। वेशक पाकिस्तानको भी अमेरिका- चीनके अलावा कोई कोई साथ नहीं दे रहा है ,और भारत ने  पाकिस्तान में सार्क सम्मेलन  निरस्त करने में सफलता भी पाई है। किन्तु  जब तक हम पाकिस्तान में छिपे बैठे असली गुनहगारों को नहीं मार देते, तब तक हमारी सीमाओं पर उरी पठानकोट, उधमपुर और पंपोर की तरह नृशंस हत्याकांड होते रहेंगे। और तब तक यूएनओ ने भी हमारी विजय को तस्दीक नहीं करेगा जब  तब तक हम असली दुश्मन का सिर नहीं कुचल देते। सरकार समर्थकों को आइंदा  'ऑपरेशन सर्जिकल स्ट्राइक' जैसी मामूली कार्य वाहियों  का ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए ! श्रीराम तिवारी !   

आज दशहरे पर देश भर में जगह-जगह रावण दहन किया जा रहा है। कुछ लोग 'आतंकवाद' को भी रावण के नाम पर जलाने जा रहे है। लेकिन नफरत के रावण को खत्म करने की कोई खास हिकमत नजर नहीं आ रही है। बल्कि 'नफरत की दीवार' की ऊँचाई  बढ़ती ही जा रही है, ठीक वैसे ही जैसे की आजकल  घास-फूस- कागजके रावणकी ऊँचाई बढ़ाने की होड़ मची है। कलतक जो लोग स्वच्छ्ता अभियान की सेल्फियाँ पोस्ट कर रहे थे वही लोग आज  वातावरण में -बारूदी  दुर्गन्ध और हर प्रकार का प्रदूषण फैलाने पर आमादा हैं। जो  मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम के सच्चे अनुयाई होंगे ,वे इस धतकरम और दिखावे और वातावरण को जहरीला बनाने में सहयोगी नहीं बनेगे। बल्कि वे भगवान् श्रीराम के धीरोदात्त चरित्र का अनुसरण करने में ही दशहरे की सार्थकता समझेंगे ।

रविवार, 21 अगस्त 2016

सावधान ! अंधश्रद्धा से ही तीसरा नेत्र खुलता है।

जो निरीह प्राणी अंधश्रद्धा में आकण्ठ डूबे हैं , जो 'त्रिनेत्र'-भक्ति के बहाने गाँजा -भाँग -धतूरे  के उपासक हैं ,शिव शंकर की तरह  यदा -कदा उनका भी तीसरा नेत्र खुल जाता है। लेकिन उनका यह तीसरा नेत्र किसी कामदेव को भस्म करने के लिए नहीं खुलता ,सामाजिक समरसताके लिए नहीं खुलता ,ओलम्पिक खेलों में मेडल लानेके लिए नहीं खुलता ,भृष्ट -बदनाम नेताओं और रिश्वतखोर अफसरों के खिलाफ नहीं खुलता ,अन्याय -शोषण और महिला उत्पीड़न के खिलाफ नहीं खुलता ,बल्कि मृत पशु उठानेवाले ,कचरा फेंकनेवाले निर्दोष दलितों पर ही इन धर्मांध भक्तों का तीसरा नेत्र खुलता है। धर्मनिरपेक्षता के दूध में साम्प्रदायिकता का नीबू निचोड़ने के लिए भी कभी-कभी उनका तीसरा नेत्र खुल जाता है। इसी तरह की मजहबी अंधश्रद्धा  इस्लामिक कट्टरपंथियों को भी जेहादी बनाती है और वे दहशतगर्द शैतान यदा -कदा अमनपसन्द आवाम पर अपना रक्तरंजित तीसरा नेत्र खोलते रहते हैं।और इसी तरह हर दबंग व्यक्ति किसी कमजोर पर ,ताकतवर समाज किसी कमजोर समाज पर और ताकतवर राष्ट्र - किसी कमजोर और गरीब देश पर तीसरा नेत्र खोलते रहते हैं ।

भारतीय योगियों,गौरक्षकों और अवतारी महापुरुषों के पास तीसरा नेत्र बहुतायत से पाया जाता है। किन्तु यह खुलता  तभी है ,जब किसी का अनिष्ट करना हो। अर्थात जब किसी को 'भस्म करना 'हो ! जो वरुण के उपासक हैं वे अपने इष्टदेव की आराधना के लिए कुआँ -बावड़ी ,नदी -नाले ,ताल -तलैयों की ऐंसी -तैसी करने में जी जान से जुटे हैं। जो  'धरती माता ' के आराधक हैं ,वे पर्यावरण  सहित नदियों और पर्वतों का कितना भला कर रहे हैं यह दिल्ली में श्री-श्री के ताम झाम के मार्फत हुए यमुना उद्धार से या एनजीटी की रिपोर्ट से  भी बखूबी समझा जा सकता है। जो गौरक्षक हैं उनकी लीला  तो अपरम्पार है, क्योंकि वे तो प्रधानमंत्रीको ही धमका रहे हैं। आधुनिक  साइंस -उन्नत सूचना संचार तकनीकी और मीडिया की असीम अनुकम्पा से सबको सब कुछ दिख रहा है। किन्तु  जिनको पर्यावरण का तातपर्य ही नहीं मालूम वे लाखों तीर्थ यात्री ,आबाल-बृद्ध नर-नारी  ही आवाम के हिस्से के रूप में जब न केवल नदियों को बल्कि पहाड़ों को भी प्रदूषित करने में जी जान से जुटे हैं। अंध श्रद्धालु  भक्तगण -सड़ी-गली फूलमालाएं ,पूजा का निर्माल्य ,मृत मानव देह , मृत पशु देह और अध् जली लाशों को गंगा-यमुना या  नर्मदा जैसी पावन नदियों में बाइज्जत विसर्जन करते रहते हैं। मुर्दों के नए -पुराने वस्त्र ,अधजली अस्थियाँ बहाये बिना तो 'भवसागर'पर होना  सम्भव ही नहीं है।  यदि इन विनाशकारी परम्पराओं को कदाचरण कहें तो अंधश्रद्धा का तीसरा बिकराल तीसरा नेत्र खुलना सम्भव है।

शनिवार, 20 अगस्त 2016

रियो ओलम्पिक में भारत की बुरी तरह धुनाई हुई है !

 आज 'अंतर्राष्टीय सीनियर सिटीजन्स डे ' है। और आज की ही खबर है कि केरल में एक बुजुर्ग महिला पर सुबह समुद्र किनारे 'शौच' जाने पर सैकड़ों कुत्तों ने एक साथ हमला बोल दिया। उस बृद्धा को मरणोपरांत अस्पताल ले जाया  गया। इस घटना से अनेक सवाल उठते हैं। पहला तो यही कि जब अभिनेत्री विद्या बालान से लेकर देश के प्रधान -  मंत्री खुद ही ' शौच' की सोच में रात दिन डूबे रहते हैं । तो फिर उसका सकारात्मक परिणाम क्यों नहीं ?  केरल जैसे तथाकथित सर्वशिक्षित प्रदेश की गरीब बृद्ध महिलाओं को समुद्र किनारे 'शौच' के लिए क्यों जाना पड़ रहा है? आजादी के बाद से अब तक जो भी दल या नेता वहाँ सत्ता में रहे उनको शर्म क्यों नहीं आ रही ?

इन दिनों भारत के सक्षम मध्यम वर्गीय बुर्जुवा लोग रियो ओलम्पिक के संदर्भ में शोसल मीडिया पर कुछ इस तरह गदगदायमान हैं, मानों ओलम्पिक सूची में भारतने अमेरिकाको पीछे छोड़ दिया  हो । कुछ चवन्नीछाप पैटी बुर्जुवा लोग अपनी औकात ही भूल जाते हैं कि जिस देश के सवा सौ करोड़ देशवासियों में से ९९%  ग्रामीण भारत खुले में शौच करने को आज भी मजबूर हैं। जिस देश के शहरी गरीब मजदूर सुबह-सुबह लौटा लेकर रेल की पटरी के किनारे जाने को मजबूर हैं ,जिस देश में क्रिकेट के खिलाडी को 'भगवान्' माना जाता हो , जिस देश के मंत्री और अफसर भृष्टाचार में आकण्ठ डूबे हों ,उस देश के  खिलाडियों से पदकों की उम्मीद करना ही नादानी है। वेशक साक्षी और सिंधु ने अपने देश के लिए जो  किया वह अतुलनीय है और देश उन्हें जो दे रहा है वह भी पर्याप्त है। किन्तु जब देश के प्रधानमंत्री खुद ही खिलाडियों को ससम्मान ओलम्पिक के लिए विदा करें और तमाम सुविधाओं का इंतजाम करें ,और सभी खिलाड़ी अपनी असफलताओं के बहाने पेश करें, तो यह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। पिछले ओलम्पिक में भारत की स्थिति इतनी खराब नहीं थी।बल्कि इस बार पहले से ज्यादा पदकों की उम्मीद थी। इसलिए वर्तमान रियो ओलम्पिक में भारत की दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। अन्यथा 'वही ढाक के तीन पात ' अगले किसी ओलम्पिक में भी  हाथ मलते रह जायेंगे। और यह भी सुनिश्चित था कि यदि भारतीय खिलाड़ी रियो ओलम्पिक से  १०-२०  मेडल ले आते तो उसका श्रेय मोदी जी को और एनडीए सरकार को ही दिया जाता । चूँकि रियो ओलम्पिक में भारत की बुरी तरह धुनाई हुई है अतः इसका श्रेय भी तय होना चाहिए !कुछ उत्साहीलाल  कांसे और चाँदी  के एक-एक मैडल पर फ़िदा होकर कुछ ज्यादा ही  पुलकायमान हो रहे हैं , मानों ओलम्पिक सूची में भारत अव्वल ही आ गया हो ! इस तरह तो दुनिया के किसी भी देश के लोगों का आचरण नहीं देखा -सूना गया। श्रीराम तिवारी !

जो अंधश्रद्धा में आकण्ठ डूबे हैं , जो 'त्रिनेत्र'की भक्ति के बहाने गाँजा -भाँग -धतूरे  के उपासक हैं ,शिव की तरह समय-समय पर उनका भी तीसरा नेत्र खुलने लग जाता है। लेकिन उनका यह त्रिनेत्र किसी कामदेव को भस्म करने के लिए नहीं खुलता ,अपितु आर्थिक -गोरखधंधे के लिए ,आश्था के बहाने सामाजिक समरसता के दूध में नीबू रस की भूमिका अदा करने के लिए  ही उघडता है।

आधुनिक योगियों,गौरक्षकों और अवतारी महापुरुषों के पास तीसरा नेत्र बहुतायत से पाया जाता है। किन्तु यह खुलता  तभी है ,जब किसी का अनिष्ट करना हो। अर्थात जब किसी को 'भस्म करना 'हो ! जो वरुण के उपासक हैं वे अपने इष्टदेव की आराधना के लिए कुआँ -बावड़ी ,नदी -नाले ,ताल -तलैयों की ऐंसी -तैसी करने में जी जान से जुटे रहते हैं। जो 'गौ -द्विज- धरती ' के सच्चे आराधक हैं ,वे तो पर्यावरण  सहित नदियों ,पर्वतों का बहुत ख्याल रखते हैं। किन्तु जिनको पर्यावरण का तातपर्य ही नहीं मालूम वे लाखों तीर्थ यात्री ,आबाल-बृद्ध नर-नारी न केवल नदियों को बल्कि पहाड़ों को भी प्रदूषित करने में जी जान से जुटे   हैं। अंध श्रद्धालु  भक्त गण - सड़े -गले फल - फूल,पूजा का निर्माल्य ,मृत मानव देह , मृत पशु देह और अध् जली लाशों को गंगा-यमुना नर्मदा में बाइज्जत विसर्जन करते रहते हैं। मुर्दों के नए -पुराने वस्त्र ,अस्थियाँ बहाना तो जन्म सिध्द अधिकार और 'पवित्र संस्कार' है। यदि इस परम्परा को कदाचरण कहें तो अंधश्रद्धा का तीसरा नेत्र खुलना सम्भव है।  सावधान ! अंधश्रद्धा से ही तीसरा नेत्र खुलता है।

सोमवार, 15 अगस्त 2016

त्वरित टिप्पणी -सार्वजानिक उपक्रमों के प्राफिट का श्रेय मोदी जी को बिकुल नहीं है।

 ७० वें स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए प्रधान मंत्री मोदी जी ने जो कुछ कहा उससे किसी को शायद ही कोई शिकायत होगी। बल्कि मुझे तो उनका पीओके , गिलगिलत - बलूचिस्तान वाला वक्तव्य बहुत सटीक लगा। इसके अलावा उन्होंने फ़ौज के जवानों को याद किया। किसानों - महिलाओं की और दलितों की बात की। सौर ऊर्जा ,दालों की कमी और पेट्रोलियम आयात पर बचाये गए बीस हजार करोड़ रुपयों की बात की ,उन्होंने सार्वजानिक उपक्रमों को घाटे से उबारने और मुनाफे में लाने का दावा किया,उन्होंने महँगाई  कंट्रोल में होने की बात की औरआगामी तीन वर्षों में देश के पांच करोड़ अन्त्यज गरीबों तक एलपीजी सुविधा पहुंचाने का वादा भी दुहराया। चूँकि भाषण का मामला वन वे है, मोदी जी प्रधान मंत्री हैं और लालकिले की प्राचीर से उन्होंने जो कुछ भी कहा है ,वह देश की आवाज है ,यह भाषण देश की पालिसी और प्रोग्राम को भी दर्शाता है। इसलिए  स्वाधीनता दिवस पर अधिकांस देशवासियों का जश्ने आजादी की शुभकानाओं के आदान - प्रदान पर आत्मतुष्ट हो जाना स्वाभाविक है। लेकिन विवेकशील राष्ट्रीय चेतनाका दायित्व है कि सापेक्ष सत्य को स्वीकार करे,और अर्धसत्यके कुहांसे को कोई रात का अँधेरा न समझ बैठे,यह  सम्पूर्ण भारतीय जनमानस का दायित्व  है।

लाल किले की प्राचीर से सत्तरवें स्वाधीनता दिवस के भाषण में मोदीजी ने एयर इण्डिया ,शिपिंग कारपोरेशन और बीएसएनएल समेत अन्य सार्वजनिक उपक्रमों को 'ऑपरेशनल प्रॉफिट' में होना बताया है ,यह न केवल मोदी सरकार के लिए ,न केवल हितग्राहियों के लिए बल्कि पूरे राष्ट्रके लिए आत्म गौरव और प्रशन्नता की बात है। किन्तु इसका श्रेय मोदी जी को बिकुल नहीं है। क्योंकि यदि उनकी वजह से बीएसएनएल में नफा  हुआ है ,तो उनके होते हुए एमटीएनएल घाटे में क्यों है ? क्योंकि भाजपा और एनडीए के चुनावी घोषणा पत्र में और कार्यनीतिक  एजेंडे में तो भारत के सार्वजनिक उपक्रम महज  'सफेद हाथी' कहा गया है । मोदीजी और भाजपा वाले तो निजीकरण के समर्थक हैं। एनडीए -प्रथम याने  अटलबिहारी सरकार के समय से ही उन्होंने सभी सार्वजनिक उपक्रमों में  १००%  एफडीआई के लिए जोर लगाया है। पूँजी निवेश की वैश्विक 'बनिया लाबी'का मोदी जी के सर पर हाथ है। इसी भृष्ट लॉबी  के इशारे पर अटलजी के दौर में स्वर्गीय प्रमोद महाजन और अरुण शौरी ने आनन्-फानन निजी क्षेत्र को लाइसेंस बाँटे थे। और देश के दुधारू डिपार्टमेंट -डीओटी को चूना लगाया था,  निजीकरण का श्रीगणेश किया था। जो लोग टाटा,अम्बानी,अडानी, सुनील मित्तल भारती के खैरख्वाह होंगे, वे बीएसएनएल का मुनाफा क्यों चाहेंगे ? वे तो उसे बेमौत मरते  देखना चाहते हैं।

जिस स्पेक्ट्रम घोटालेकी बात मोदीजीऔर भाजपावाले चटखारे लेकर बार-बार करते रहतेहैं , उसका बीजांकुरण भले ही नरसिम्हाराव ,सुखराम , दयानिधि मारन ने किया हो ,किन्तु असल खिलाड़ी तो प्रमोद महाजन और अरुण शौरी ही थे। वेशक सन २००४ के बाद डॉ मनमोहनसिंह की यूपीए सरकार में द्रुमक के भृष्ट संचार मंत्री ए राजा और करूणानिधि की बेटी कनिमोझी ने भी खूब घोटाले किये। डॉ मनमोहन सिंह ,सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी यह सब रोकने में और  मॉनिटरिंग करने में असफल रहे।  सार्वजानिक उपक्रमों को बर्बाद करने के लिए एनडीए और यूपीए दोनों बराबर के जिम्मेदार हैं। पहले तो अटलबिहारी सरकार ,फिर डॉ मनमोहनसिंह की दस सालाना यूपीए सरकार ने और मोदी सरकार ने लगातार विश्व बैंक और अमेरिकी दवाव में आकर न केवल बीएसएनएल बल्कि सभी सार्वजनकि उपक्रमों में १००% एफडीआई के दरवाजे खोल दिए हैं । किन्तु वामपंथी ट्रेड यूनियनों ने   यह राष्ट्रघात नहीं  होने दिया। अब यदि बिना  १ % एफडीआई के भी बीएसएनएल ऑपरेशनल  प्रॉफिट में आ गया है तो उसका श्रेय संगठित ट्रेडयूनियन आंदोलन को जाता है। क्योंकि वेशक निवृतमान संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद जी का भी सहयोग सराहनीय रहा है ,इस नाते मोदी जी भी अपनी पीठ खुद थोक सकते हैं। लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब  दूर संचार विभाग की  मोनोपाली थी तब भी भारत सरकार के खजाने में अरबों-खरबों डॉलर कमाकर यही दिया करता था। एक बढ़िया सरकारी विभाग को सार्वजानिक उपक्रम बनाया ही इसलिए गया था कि वह घाटे में आ जाये ,और तब सरकार उसका निजीकरण करदे। इसीलिये तत्कालीन ही एनडीए की अटल सरकार ने इसको जबरन  लिमिटेड कम्पनी बना दिया। लेकिन संयोग से बीएसएनएल के कर्मचारी/अधिकारी का बहुत मजबूत और संगठित मोर्चा  है,इसीलिये अब तक बीएसएनएल बचा हुआ है। इसमें मोदी जी की कोई मेहरवानी नहीं है।

भारत जैसे विशाल लोकतान्त्रिक देश के प्रधान मंत्री की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह कम से कम स्वाधीनता दिवस पर तो सच बोलें ! यदि  एफडीआई के बगैर बीएसएनएल मुनाफा दे सकता है तो  एमटीएनएल पब्लिक शेयर का क्या मतलब है ?जबकि वह घाटे में जा रहा है। मोदी जी एमटीएनएल को प्राफिट में लाने का प्रयास क्यों नहीं करते?  बंद हो चुके अनेक उपक्रमों की सुध क्यों नहीं लेते ?चूँकि आमतौर पर  प्रधानमंत्री द्वारा  स्वाधीनता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से दिए गए भाषण के निहतार्थ  बहुत व्यापक और दूरगामी होते हैं ,इसलिए उन्हें अपनी कॉलर ऊंची करने या आत्मप्रशंसा करने से बचना चाहिए। उनकी जग हँसाई से देश की भी जग हंसाई हो सकती है। ।  श्रीराम तिवारी। 

शनिवार, 6 अगस्त 2016

यह तो उनके लिए आन-बान -शान की बात है।


बहुत ही दुखद सूचना है कि  राजस्थान की एक सरकारी गौशाला में  में ५०० गायें एक साथ मार दीं गयीं गयीं ! ये गायें कैसे मरीं? क्यों मरी ? उनकी मौत के लिए कौन जिम्मेदार है ? यह तो मुख्यमंत्री वसुंधरा जी ही बता पाएंगी। और यदि सचाई जानना है तो किसी ऐसे पशु चिकित्सक को खोजना पडेगा जो बिना व्यापम भृष्टाचार के ,बिना रिश्वत के और बिना किसी नेता के सहयोग के भी डॉ बन पाया हो !हालाँकि  गौलोक धाम जा चुकी 'गौमाताओं'को कोई इससे कोई फर्क नहीं पड़ताकि उन्हें किसने मारा और क्यों मारा ? लेकिन इस संदर्भमें उन सच्चे 'गौसेवकों' की भूमिका पर सभी की नजर रहेगी,जिन्होंने 'गौरक्षा 'के नाम पर कानून को अपने हाथमें ले रखाहै और देशभर में हिंसक  उपद्रव मचा रखा है।

भारत की जनता और दुनिया के तमाम शांति-प्रेमी लोग इंतजार कर रहे हैं किये 'स्वयम्भू' गौसेवक कब अपनी ५०० गौमाताओं के क्रूर हत्यारों के शीश काटकर जयपुर स्थित राजभवन के समक्ष पेश करते हैं। क्योंकि यह तो उनके लिए आन-बान -शान की  बात है। वे  जब किसी अज्ञात पशु के थोड़े से मांस के  लिए हरियाणा में किसी 'अखलाख' को मार सकते हैं । जब गुजरात में किसी बूढ़े -बीमार मृत पशु की देह उठाने वालों को , जंगल में पशु का शव फेंकने गए गरीब 'दलित बंधुओं' को महज चमड़ा उधेड़ने पर लहूलुहान कर सकते हैं ,उन्हें धर्म-परिवर्तन के लिए मजबूर कर सकते हैं ,तो ५०० गौमाताओं के हत्यारों को कैसे छोड़ा जा सकता है? यदि 'हिंदुत्व वीरों ' ने इन गौ माताओं की हत्याका बदला नहीं लिया और 'कानून को हाथ में नहीं लेने' का पाखण्ड किया तो उन्हें इसका जबाब देना होगा कि उन्होंने गुजरात में दलितों को क्यों पीटा ? उन्होंने हरियाणा में 'अखलाख को क्यों मारा ?

श्रीराम तिवारी !

मंगलवार, 12 जुलाई 2016


ताजा खबर है कि भारत के नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात, पुलिस के जवानों को मच्छर बहुत सत्ता रहे हैं। मच्छरों के काटने और स्वच्छ पेय जल नहीं मिलने के कारण मलेरिया,डेंगू ,चिकनगुनियां ,पेचिस,पीलिया इत्यादि बीमारियों ने एमपी छ्ग के पुलिस जवानों को बुरी तरह घेर रखा है। ताज्जुब है कि नक्सलवादियों को ये बीमारियाँ कदापि नहीं व्याप्ती। जबकि उनके पास इन बीमारियों से बचाव के कोई आधुनिक संसाधन भी  नहीं होते। श्रीराम तिवारी ! 

सोमवार, 11 जुलाई 2016

 १०-११ जून -२०१६ को अपनी नाइजीरिया यात्रा के दौरान हमारे अति लोकप्रिय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 'दार -ए -सलाम' की एक महती सभा में उपस्थित लगभग २० हजार भारतीय मूल के लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा :- ''भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और सर्वाधिक 'युवा देश' है। भारत की ६५% आबादी ३५ वर्ष की आयु के आसपास है,भारत में दुनिया की सर्वाधिक युवा शक्ति मौजूद है '' सवाल उठना लाजिमी है कि इस उपलब्धि में मोदी जी का क्या योगदान है ? श्रीराम तिवारी



रविवार, 10 जुलाई 2016

आतंकी संगठन 'हिजबुल  मुजाहिदीन' के स्वयम्भू शीर्ष कमांडर ' बुरहान बानी'के मारे जाने पर कश्मीरी अलगाववादियों द्वारा  कश्मीर में हिंसक हुड़दंग मचाना और पाकिस्तान का बौखलाना कोई नयी बात नहीं ,यह तो उनका स्वाभाविक चरित्र है। किन्तु जेएनयू छात्र उमर खालिद द्वारा आतंकी अलगाववादी -बुरहान बानी  की तुलना 'चे ग्वेरा' से करना कोरी बकवास है। इस तरह की घटिया तुलना करने से उमर खालिद की वैचारिक अपरिपक्वता का सहज बोध होता है। बुरहान बानी एक १००% अलगाववादी और मजहबी आतंकी  था ,उससे  १००% धर्मनिरपेक्ष और सर्वहारा वर्ग के क्रांतिकारी नायक से तुलना करना निहायत ही आपत्तिजनक और  निंदनीय है। श्रीराम तिवारी
 

मंगलवार, 21 जून 2016

यदि भारत को एनएसजी से वंचित रखा जाता है तो !


ताजा-ताजा अमेरिकी यात्रा के दौरान अमेरिकी कांग्रेस में  ७२ बार तालियाँ पिटवाने  और समस्त सीनेटर्स द्वारा नौ बार कोर्निश करवाने से गदगद मोदी जी ने  वतन लौटते ही  आनन -फानन खुदरा क्षेत्र में ,कृषि क्षेत्र में  और रक्षा क्षेत्र में सौ फीसदी [१००%] एफडीआई को मंजूरी दे दी है। इतनी बड़ी क़ुरबानी देने के बाद भी हमारी [भारत की ]  एनएसजी [न्यूक्लियर सेफ्टी ग्रुप ]में प्रवेश की बाधाएं यथावत मौजूद हैं। केवल कोरी कूटनीतिक कलाबाजी का शोर है !

  मान लो कि मोदी जी एनएसजी की प्रविष्टि के लिए चीन को मना भी लेते हैं।  लेकिन पाकिस्तान की चुनौती तो तब भी कायम है। अभी अभी  सरताज अजीज ने खुद  ही पाकिस्तान असेम्ब्ली में फरमाया है  कि  ''हम भारत का एनएसजी में प्रवेश रोकने में कामयाब रहे ,इंशा अल्लाह पाकिस्तान ही एनएसजी में शामिल किया जाएगा। ''  हो सकता है कि सरताज अजीज कोरी गॅप नहीं हाँक रहे हैं ,उन्होंने छोटे-बड़े ५o इस्लामिक देशों को  और चीन को पाकिस्तान के पक्ष में पहले ही कर लिया है। अब यह भारतीय विदेश नीति की असफलता का चरम बिंदु होगा यदि भारत को एनएसजी से वंचित रखा जाता है ! भारत में शतप्रतिशत एफडीआई खोलने तथा देश के युवाओं की नौकरी ,किसानों की आजीविका और खुदरा व्यापारियों का बिजन्मेस दाँव पर लगाने के बाद भी यदि भारत  को एनएसजी से वंचित रखा जाता  है तो यह न सिर्फ भारत की गरिमा के खिलाफ होगा ,बल्कि मोदी सरकार की सेहत के लिए भी अच्छा नहीं होगा ! दक्षिण एशिया के लिए  और शांतिपूर्ण दुनिया के लिए भी यह वेहद  खतरनाक होगा ! श्रीराम तिवारी  

शनिवार, 28 मई 2016

कोई हमारे 'जुमलों' का मजाक न उडाये !


  कुछ टीवी चैनल्स और प्रिंट मीडिया वाले खबरें दे रहे हैं कि  मोदी सरकार के दो साल का कामकाज  बेहतर रहा। उनके सर्वे [!] के अनुसार देश के ६२% लोग मोदी सरकार के कामकाज से खुश हैं। इस प्रायोजित प्रचार के दो बड़े निहतार्थ हो सकते हैं। एक तो यह कि मोदी सरकार का कामकाज देश के बहुमत जन को  पंसद है। दूसरा यह कि  देश की जनता को वह दिख भी रहा है।  सवाल यह उठता है कि जब जनता के बहुमत [६२%] ने तस्दीक कर दिया है कि सरकार  खूब काम कर रही है  और अच्छे दिन आ गए हैं  तो करोड़ों रूपये खर्च करके  'दो साल की उपलब्धियों' का ढिंढोरा पीटने की क्या जरुरत आ  पडी है ? क्या पिछलग्गू मीडिया के प्रायोजित सर्वे पर उन्हें  विश्वास नहीं ? क्या वे  देश की जनता को मूर्ख समझते हैं और इसलिए यह बताने जा रहे हैं कि ;-

हे भारत वासियो ! यह राष्ट्र अब भय,भूंख,भृष्टाचार,सूखा,अकाल,शोषण-उत्पीड़न और आतंकवाद से मुक्त हो चुका है !आइन्दा इसे विपक्ष से मुक्ति दिलानी है ,क्योंकि जब तक देश में विपक्ष है तब तक हम 'सीनेरोटा अथवा 'फ्यूहरर' नहीं न पाएंगे ! इसलिए अब हर आम और खास को एतद द्वारा सूचित किया जाता है कि वह देश को गैर भाजपा दल और धर्मनिरपेक्ष विचारों से मुक्त करने में जुट जाए !  देश की आवाम को चाहे जितनी  परेशानी हो  लेकिन कोई हमारे 'जुमलों' का मजाक न उडाये !क्योंकि  यदि 'एक झूंठ सौ बार बोला जाये तो सच हो जाता है' तब हमारे जुमले सौ बार दुहराए जाने पर सच क्यों नहीं होंगे ?

बुधवार, 25 मई 2016

क्या गांधी -नेहरू परिवार को देश से माफी मांगनी चाहिए ?



फेसबुक पर नेहरू जी की तारीफ़ करना कलेक्टर अजयसिंग गंगवार जिला -बड़वानी [मध्यप्रदेश] को भारी  पड़ रहा है। मध्यप्रदेश सरकार ने श्री गंगवार को कलेक्टरी से हटाकर मंत्रालय में शिफ्ट कर दिया है। सोशल मीडिया में नीतिगत टिप्पणी को लेकर  राज्य सत्ता द्वारा किसी अधिकारी की बाँह मरोडने का यह पहला बाकया है !लेकिन इस प्रकरण से जाहिर हो रहा है कि अधिकांश उच्च अफसर ,डॉ ,इंजीनियर , आईएएस ,वकील,पत्रकार तथा वैज्ञानिक भी वर्तमान दौर के शासकों के धतकर्मों से नाखुश हैं। और वे महसूस कर रहे हैं कि नेहरुवाद  के खिलाफ सत्ता नियोजित झूंठा दुष्प्रचार एक राष्ट्रघाती षड्यंत्र है ,जिसका प्रतिकार हर हाल में होना चाहिए ! जिसका श्री गणेश श्री अजयसिंह गंगवार ने क्र दिया है !

इसी तारतम्य में  मध्यप्रदेश सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से अभी-अभी एक सरकूलर भी जारी हुआ है । जिसमें प्रदेश के सभी अफसरों को हिदायत दी गई है कि वे 'सिविल सर्विस रूल्स का मुस्तैदी से पालन करें '! हर खास -ओ -आम को विदित हो कि ये कथित सिविल सर्विस रूल्स अंग्रेजों ने भारत की जनता को गुलाम बनाए रखने के उद्देश्य से बनाए थे ।आजादी के बाद भारत के संविधान निर्माताओं ने आँख मूँदकर अंग्रेजों के इस अवांछनीय  सिविल सर्विस रूल्स के पुलंदे को यथावत जारी रखा है । इनमें वे श्रम विरोधी कानून भी शामिल हैं। जिनके खिलाफ लाला लाजपत राय ने अंग्रेजों की लाठियाँ खाईं और शहीद भगतसिंह,सुखदेव ,राजगुरु ने शहादत दी। अंग्रेजी राज के काले कानूनों का ठीकरा आजाद भारत के संविधान में शुमार करके कुछ लोग तो भगवान भी बन बैठे ! भारत की आवाम को यह जानने  की सख्त जरुरत है कि इन रूल्स का लब्बोलुआब क्या है ? चूँकि अंग्रेजो का आदेश था कि गुलाम भारत के अधिकारियों को खुद होकर समझ-बूझ विवेक से काम नहीं करना है । बल्कि जो अंग्रेज सरकार याने स्वेत प्रभु कहें ,सिर्फ उसका अक्षरसः पालन करना है। यह सिलसिला आज भी जारी है। जिस किसी अहमक को मेरी बात पर यकीन ने हो वह किसी भी आईएएस या वरिष्ठ वकील से तस्दीक करतस्ल्ली कर ले !

गोकि अंग्रेज तो  चले गए लेकिन  गुलामी की निशानी के रूप में अपना सिविल सर्विस रूल्स छोड़ गए । इसके अलावा भी अंग्रेज बहुत कुछ छोड़ गए ! वे धर्म-जात के रूप में  फुट डालो राज करो की राजनीति भी छोड़ गए !अभिव्यक्ति की आजादी पर लटकती हुई नंगी तलवार छोड़ गए ! और अब अंग्रेजों की जगह शुद्ध भारतीय शासक सत्ता में विराजमान हैं । देशी भाई लोग अंग्रेजी राज की शिक्षा प्रणाली और उनके सिविल सर्विस रूल्स को  पावन चरण पादुका समझकर  बड़ी  ईमानदारी और निष्ठा से पुजवा रहे हैं । यदि कोई  पढ़ा-लिखा स्वाभिमानी अधिकारी अपनी कोई स्वतंत्र राय व्यक्त करता है तो 'अंग्रेजी सिविल सर्विस रूल्स' आड़े आ जाते हैं।  ताजा उदाहरण  जिला कलेक्टर बडवानी श्री अजयसिंग गंगवार  का है ,उन्होंने फेस बुक पर जब नेहरू विषयक - स्वतंत्र विचार रखे तो उनको मजबूरन तत्काल वह पोस्ट  हटानी पडी !  संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्रप्रसाद थे , सरदार पटेल ,पीडी टण्डन ,मौलाना आजाद, जगजीवनराम ,कृपलानी और लोहिया जैसे बड़े-बड़े नेता इस संविधान सभा के सदस्य थे। जबकि पंडित नेहरू को इससे बिलकुल अलहदा रख गया  .यही वजह है कि अंग्रेजी गुलामी का स्वामिभक्ति वाला अक्स भारतीय संविधान में कांटे की तरह अभी भी खटक रहा है। इसकी एक बानगी प्रस्तुत है ,,,,,!

''कलेक्टर अजयसिंह गंगवार द्वारा मंगलवार -२५ मई -२०१५ को फेस बुक पर की गयी पोस्ट प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई है। नेहरू-गांधी परिवार की व्यंगात्मक रूप से प्रशंसा भरी पोस्ट में कलेक्टर अजयसिंह ने कई मामलों पर कटाक्ष किये हैं। अगले दिन जब इस पोस्ट को लेकर कलेक्टर साहब से उनकी प्रतिक्रिया पूँछी गई तो उन्होंने निजी विचार कहकर बात खत्म कर दी,लेकिन देर रात विवाद बढ़ता देखकर उन्होंने उस पोस्ट को हटा लिया। '' [साभार नई दुनिया ,इंदौर  दिनांक २६-५-२०१६ ,पेज-११]

मध्यप्रदेश के बडवानी जिला कलेक्ट्रर श्री अजयसिंह गंगवार ने अपनी पोस्ट में यह लिखा था ;-''जरा गलतियाँ तो बता दीजिये जो पंडित नेहरू को नहीं करनी चाहिए थी ,बहुत अच्छा होता ! यदि उन्होंने [पंडित नेहरू ने ]आपको [भारत को ] १९४७ में हिन्दू तालिवानी राष्ट्र नहीं बनने दिया ,तो यह उनकी गलती है ! उन्होंने [नेहरू ने ] आईआईटी ,इसरो,बीएआरएसी ,आईआईएसबी ,आईआईएम,भेल,गेल ,रेल, भिलाई राउरकेला स्टील प्लांट, भाखड़ा नंगल जैसे डेम्स, नेशनल थर्मल पावरपलांट ,एटामिक एनर्जी कमीशन स्थापित किये ,यह उनकी गलती थी ! पं नेहरू ने आसाराम और रामदेव जैसे इंटेलक्चुवल्स की जगह होमी जहांगीर भाभा , विक्रम साराभाई ,विश्वेशरिया ,सतीश धवन ,जेआरडी टाटा और जनरल मानेक शा को देश की बेहतरी के लिए काम करने का मौका दिया ,यह नेहरू की गलती थी ! पंडित नेहरू ने गोमूत्र को बढ़ावा देने के बजाय मेडिकल कालेज खोले ,उन्होंने मंदिर बनवाने के बजाय यूनिवर्सिटीज खोलीं ,यह पंडित नेहरू का अक्षम्य अपराध है ! पंडित नेहरू ने आपको अंध विश्वासी बनाने के बजाय साइंटिफिक रास्ता  दिखाया ,यह भी उनकी भयंकर भूल थी ! इन तमाम गलतियों के लिए गांधी -नेहरू परिवार को देश से माफी अवश्य मांगनी चाहिए !''

बड़वानी कलेक्टर अजय गंगवार ने भले ही व्यंगात्मक रूप से नेहरू परिवार की फेस बुक वाल पर प्रशंसा की हो पर उनकी आईएएस विरादरी ने इससे अपनी असहमति जताई । कुछ अंग्रेजीदां सीनियर आईएएस का कहना है कि  प्रशासनिक अधिकारी को राजनीति से दूर रहना चाहिए ! हालाँकि सामान्य प्रशासन मंत्री लालसिंह आर्य ने बहुत सटीक टिप्पणी की है ,उनका कहना है कि ''अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  तो सभी को है ,कलेक्टर साहब ने जो किया वह अपराध नहीं है ,उन्होंने उत्साह में लिख दिया होगा। उन्हें सिविल सर्विस रूल्स का पालन तो करना ही होगा ''! उजड्ड भाजपा नेताओं को और संघ अनुषंगियों को अपने काबिल मंत्री लालसिंह आर्य  से भद्र व्यवहार अवश्य  सीखना  चाहिए ! श्री लालसिंह आर्य ने समझदारी भरा वयान दिया ,जिसकी प्रशंसा की जानी  चाहिए ! जब कोई कांग्रेसी देश हित  की बात करे तो दिल खोलकर उसका भी सम्मान होना चाहिए ! कांग्रेस और भाजपा वालों को मेहरवानी करके एक दूसरे से घृणा करने के बजाय स्वस्थ प्रतिष्पर्धा करनी चाहिए। उन्हें वामपंथ के जन संघर्षों को देखकर भी कपडे नहीं फाड़ना चाहिए !

 स्मरण रहे कि  संघ परिवार के मार्फत आजाद भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तित्व और कृतित्व पर हमले १५ अगस्त-१९४७ से अब तक  निरंतर जारी हैं । किसी कलेक्टर ने पंडित नेहरू के अवदान को  सराहा , उनके कृतित्व को याद रखा ,यह तो भारतीय परम्परा की महान उपलब्धि है ,इंसानियत का श्रेष्ठतम  श्रेष्ठ गुण है। जबसे केंद्र की सत्ता में मोदी सरकार आई है  वस्तुओं के दाम तो बढे हैं किन्तु मानवीय मूल्यों में भी गिरावट आई है।  नेहरूजी के व्यक्तित्व ,कृतित्व और विचारों पर सड़कछाप हमले जारी हैं। देश में अधिकांश युवा नहीं जानते कि ''हम लाये हैं तूफ़ान से किस्ती निकाल के ,,इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भल के ,,,,जैसा गीत किसकी प्रेरणा से लिखा गया। नेहरुवाद का और प्रगतिशीलता का वास्तविक सन्देश क्या है ? देश में सत्ता परिवर्तन  बुरा नहीं है ,किन्तु सत्ता परिवर्तन के बाद सत्ताधारी नेतत्व में प्रतिस्पर्धात्मक कुंठा स्पष्ट झलक रही है। वैसे तो आर्थिक विपन्नता और साधनों के अभाव में असंतोष की अनुभूति हर साधारण मनुष्य का सहज स्वभाव है। इस प्रकार की बिडंबना से गुजरने वाले लोगों का व्यवस्था के प्रति विद्रोह स्वाभाविक है। लेकिन जो नेतत्व सत्ता में है उसे अपनी लकीर बढ़ाने का हक है लेकिन अपने पूर्वर्ती की लकीर मिटाकर अपना अधःपतन  दिखलाना उन्हें शोभा नहीं देता। अपने पूर्वजों की उपलब्धि को अपनी बताने वाला कृतघ्न कहलाता है। यदि मौजूदा व्यवस्था की खामियों के लिए स्वाधीनता सेनानी या पूर्ववर्ती नेतत्व,मंत्री - जिम्मेदार हैं तो उनके द्वारा अर्जित उपलब्धियों के श्रेय से उन्हें भी वंचित नहीं किया जा सकता ! अतीत की  सामूहिक भूलों या वैयक्तिक गलती के प्रति रोष स्वाभाविक है। किन्तु यदि  किसी व्यक्ति , समाज  या देश के वर्तमान हालात नाममात्र भी पहले से बेहतर हैं तो ही उन पर अंगुली उठनी चाहिए ! दरपेश नयी समस्याओं के लिए  क्या मौजूदा  शासन-प्रशासन जिम्मेदार नहीं है ?  क्या खुद की असफलताओं के लिए कृतघ्नता का भाव मुनासिब  है ?अपने ही  पूर्वजों की अकारण निंदा ,उनके प्रति अकारण ही असंतोष  का  भाव किसी भी व्यक्ति या समाज  को सभ्य नागरिक नहीं बना सकता। अपितु  नकारात्मकता की खाई में अवश्य धकेल देगा । समृद्ध राष्ट्र की सम्पूर्णता के लिए पूर्वजों,स्वाधीनता सेनानियों और अतीत की समस्त धरोहर के प्रति सम्मान भाव ही वास्तविक देशभक्ति का भाव जग सकता है !

   समर शेष है ,निशा शेष  है ,नहीं पाप का भागी केवल व्याध।
  जो तठस्थ हैं समर भूमि में ,समय लिखेगा उनका भी इतिहास।।  [ राष्ट्रकवि -दिनकर ]

श्रीराम तिवारी


शुक्रवार, 25 मार्च 2016

नकली 'दशभक्त' खीसें निपोर रहे हैं। छि:

 चूँकि इस बृह्माण्ड में त्रुटिहीन  अर्थात दोषरहित कोई वस्तु है ही नहीं , इसलिए सर्वोत्तम समझ-बूझ यही है कि मौजूद तमाम बुराइयों में से किसी एक अल्पतम बुराई को अंगीकृत   कर  आगे बढ़ा जाये ! जैसा कि  अभी-अभी भाजपा  ने कश्मीर में लोकशाही कायम करने के निमित्त किया है। भाजपा और पीडीपी के समक्ष  इसके अलावा और जो भी विकल्प हैं वे इससे  भी बुरे हैं. इसलिए यही एक 'कम बुरा' उपाय दरपेश था जो भाजपा और पीडीपी ने साझा किया है। यह सर्वविदित है कि पीडीपी के  ही एक विधायक ने  श्रीनगर और दिल्ली में सरे आम 'बीफ' पार्टी दी थी।  यह भी सभी को मालूम है कि  इसी पार्टी के कश्मीरी युवाओं ने  कश्मीर में भारतीय सेना पर अनेकों बारे पत्थरबाजी की है।  यह भी सभी ने  टीवी न्यूज और अखवारों में देखा-पढ़ा है कि  यही लोग आये दिन कश्मीर में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे  लगाते  रहे हैं। और पाकिस्तानी झंडा भी फहराते  देखे गए हैं। इन  तमाम बुरी स्मृतियों के वावजूद हर सच्चा देशभक्त यही चाहेगा कि कश्मीर में लोकतंत्र कायम रहे और राष्ट्रपति शासन की नौबत न आये।  कश्मीर की इस राजनैतिक मशक्क्त  को देख सुनकर उन्हें चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए जो जेएनयू को देशद्रोहियों का अड्डा बता रहे हैं। एक -दो कश्मीर लड़कों के हरामीपन से कन्हैया जैसे देशभक्त छात्रों की वैचारिक उचाईयों पर कीचड़ उछाला जा रहा है। देश का तमाम दक्षिणपंथी मीडिया [छि " न्यूज ],बस्सी छाप दिल्ली पुलिस और बीमार मानसिकता के नकली राष्ट्रवादियों ने 'भारत माता की जय 'के नाम पर पूरी भारतीय अस्मिता का घोर अपमान किया  है।  अब कश्मीर में उनके आका  पीडीपी के बीफ खाउ नेताओं के तलवे  चांट रहे हैं तो ये नकली  'दशभक्त' खीसें निपोर रहे हैं। छि " धिकार है  इस साम्प्रदायिक मानसिकता और दोगली  'देशभक्ति'  को !