शनिवार, 28 जनवरी 2017

''दुनिया के मेहनतकशो एक हो '

अमेरिका,रूस,जापान,जर्मनी,इंग्लैंड,फ़्रांस अथवा भारत - किसी भी मुल्क पर नजर डालिये ,सभी देशोंके वर्तमान शासक या तो ट्रम्प,पुतिन,सिंजो आबे की तरह खुद पूँजीपति हैं या वे भारतीय शासकों की तरह पूँजीपतियों के एजेंट हैं। अब ट्रम्प और पुतिन जो कहेंगे दुनिया में वही होगा। ये बड़े देशों के लूटखोर पूँजीपति और करप्ट नेता 'परोपकार' के लिए सत्ता में नहीं आये हैं। चूँकि भारत जैसे  विकासशील देशों के नेता केवल 'Yes Sir' याने दुम हिलाना भर जानते  हैं। इसलिए वैश्विक परिष्थितियां इशारा कर रहींहैं कि समानता,बंधुता,और आर्थिक स्वतंत्रता के लिए पुनः संघर्ष का बिगुल बजेगा !इस क्रांति का नेतत्व सर्वहारा वर्ग नहीं करेगा ! बल्कि सूचना और संचार तकनीकी में दक्ष ,साइंस -टेक्नालाजी में दक्ष  उच्च शिक्षित आधुनिक युवा वर्ग इसका नेतृत्व करेगा ! परिश्थिति हर तरह से क्रांति के अनुकूल है केवल 'वर्ग चेतना'की दरकार है। मार्क्स एंगेल की शिक्षाओं से ही यह सम्भव होगा ! जाति -पांति मजहब आधारित संसदीय लोकतंत्र प्रणाली और भृष्ट चुनाव प्रक्रिया से यह क्रांति सम्भव नहीं।

आस्ट्रेलिया चीन और एशियन टाइगर्स के अलावा तमाम पूँजीवादी देशों के युवाओं को रोजगार के अवसर बहुत कम होंगे। भारत जैसे देशों में पहले से ही भयानक बेरोजगारी है,यहाँ 'श्रम शक्ति' का मूल्य बहुत सस्ता है । कार्ल मार्क्स का कथन है कि ''श्रम शक्ति का मूल्य जितना कम होगा ,पूंजीपति का अतिरिक्त मुनाफा उतना ही ज्यादा होगा।''काम के घण्टे [working hours]बढ़ाने में भी यही सिद्धांत काम करता है। इसलिये मुनाफाखोर पूँजीपति लोकतांत्रिक चुनाव में परोक्ष रूपसे हस्तक्षेप करते हैं। वे धनबल के द्वारा मीडिया ,मजहबी-जातीय नेताओं और साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा किसी खास नेता और खास पार्टी को जिताने में मददगार होते हैं। पूँजीवाद  ऐंसी सरकार पसन्द करता है जो युवाओं को स्थाई रोजगार देने के बजाय रोजनदारी मजदूर बनाकर रखे।

प्राइवेट मालिकों की गुलामी में अपनी जवानी खपा रहे भारतीय युवाओं को यह समझना होगा कि उन्हें उनके परिश्रम का उचित मूल्य नहीं दिया जा रहा है। १३० साल पहले शिकागो के शहीदों ने मालिकों और कंपनियों में 'आठघण्टे ' सुनिश्चित किये जाने के लिए अपना बलिदान दिया था। यदि आज कोई उच्चशिक्षित युवा आठ घंटे से ज्यादा काम करता है,और बदले में भले ही उसे दस लाख का पैकेज मिला हो ,किन्तु मार्क्स की दृष्टि में यह उस युवक का शोषण है। शिक्षित मनुष्य के जीवन की सार्थकता यही है कि अपने हक़ के लिए संघर्ष में एकजुट हो। लेनिन ने किसानों-मजूरों और युवाओंको एकजुट करते हुए संघर्ष किया था. और सोवियत क्रांति सफल रही थी। किन्तु अमेरिकी साम्राज्यवाद ने ७० साल बाद उस क्रांति को उलट दिया! अब पुनः वक्त आया है की नारा बुलन्द हो ''दुनिया के मेहनतकशो एक हो ' !

फायदा भंसाली को ही होगा !



यदि कोई फिल्म निर्माता निर्देशक यथार्थ पर आधारित कलात्मक अथवा मनोरंजनीय फिल्म बनाता ,यदि उसमें शाहरुख खान ,संजय भंसाली, सलमान खान की तरह पैसा कमाने की अनलिमिटेड टुच्ची भूंख नहीं होती तो मैंभी उनके अधिकारों की पैरवी करता। यदि मुझे यकीन होता कि संजय भंसाली ने शाहरुख़ खान ,सलमान खान की तरह जानबूझकर अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट को विवादास्पद नहीं बनाया है,यदि मुझे यकीन होता कि संजय लीला भंसाली ने राजपूतों की -कर्णी सेना को जानबूझकर नहीं उकसाया है ,यदि मुझे मालूम होता कि मार-कुटाई की यह घटना फ़िल्मी  'टोटका'नहीं है ,तो देश के तमाम कलाप्रेमियों की तरह मैं भी उसकी अभिव्यक्तिकी स्वतन्त्रता का पक्षधर होता।लेकिन मुझे मालूम है कि कर्णी सेना तो सिर्फ कानूनी तौर पर गलत है किन्तु भंसाली ने अपनी 'माँ ' को ही गाली दी है। भंसाली का यह अक्षम्य अपराध है। फिल्म इंडस्ट्रीज ने अंडर वर्ल्ड का सहारा लेकर पहले भी देश के साथ हमेशा विश्वासघात किया है। अब बाजारीकरण के इस दौर में तमाम फिल्म वाले अब नफा कमाने के लिए इतिहास का मजाक उड़ा रहे हैं ! वेशक करनी सेना को कानून हाथ में नहीं लेना था किन्तु जब किसी की कोई नहीं सुनता तो सब यही रास्ता अख्तयार करते हैं। हालांकि इस घटना से फायदा भंसाली को ही होगा !

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

सहज,सरल और तरल जीवन !



आपकी विद्वत्ता इससे नहीं मानी जायेगी किआप कितना अधिक पढ़े-लिखे हैं ?आप कितने बड़े ज्ञानी या विद्वानहैं यह इससे मूल्यांकित नहीं होगा कि आप कितने महान गणितज्ञ हैं ?आपकी विद्वत्ता इससे सुनिश्चित नहीं हो सकती कि आपने दर्शनशास्त्र,समाज शास्त्र ,मनोविज्ञान,भूगोल,अंतरिक्ष विज्ञान ,परमाणु विज्ञान,भाषा विज्ञान ,व्याकरण,  नृतत्व समाजशास्त्र,भूगर्भशास्त्र ,चिकित्साविज्ञान का कितना अध्यन किया है ? आपने ईश्वर,धर्म,मजहब ,अध्यात्म और राजनीतिशास्त्र पर कुंटलों कागज काले क्यों न कर डाले हों ? आपका संचित ज्ञानकोष कितना चाहे कितना ही समृद्ध क्यों न हो ?यदि आप किसी रोते हुए बच्चे को हँसा नहीं सकते ,यदि आप अपने ही सपरिजनों या बुजुर्गों को खुश नहीं कर सकते ,यदि आप खुद भी खुशियों से महरूम हैं ,तो आपका संचित ज्ञानकोष आपके लिए भी जहर ही है। आप तत्काल उससे मुक्त हो जाइये ! आप सहज,सरल और तरल जीवन जीने की कोशिश कीजिये !यदि आप वास्तव में ज्ञानी हैं तो किसी भी व्यक्ति,विचार अथवा वस्तु के व्यामोह से बचिए और अहं का बोझ भी तत्काल उतारकर फेंक दीजिये ! श्रीराम तिवारी !  

रविवार, 22 जनवरी 2017

'हुआ-हुआ' पर क्या हुआ ?


 यदि कांग्रेस सपा के साथ या सपा कांग्रेस के साथ विश्वासघात न करे तो सपा रुपी 'काठ की हाँड़ी' दूजी बार भी सत्ता के चूल्हे पर चढ़ सकती है। गठबंधन के नेता अखिलेश यादव अपने सभी प्रतिद्वंदियों से कई गुना बेहतर है।\

फेसबुक पर अक्सर अच्छी पोस्ट पर कम 'लाइक' मिलते हैं,,जबकि घटिया और वाहियात मुद्दे पर ढेरों लाइक मिलने लगते हैं। इसको इस मेटाफर से समझें कि कुँजड़े की दुकान पर या किराने की दुकान पर हमेशा भीड़ रहती है ,जबकि जौहरी की दुकान पर कभी- कभार इक्का -दुक्का ही पहुँच पाते हैं।  पर क्या हुआ ?

यदि लोकतंत्र को भीड़तन्त्र से बचाना है तो आस्था,पाखण्ड और परम्पराओं से ऊपर राष्ट्र के संविधान को मानना ही होगा। जल्लीकट्टू को लेकर तमिल युवा पागलपन और उन्माद से ग्रस्त हैं। उन्हें संविधान की फ़िक्र नहीं है।

जंगल में एक परंपरा है की जब किसी स्यार की जुबान में खुजली होती है तो हुआ-हुआ करता है। जब कभी एक स्यार  'हुआ' बोलता है तो बाकी के सभी स्यार भी  'हुआ-हुआ' करने लग जाते हैं। सारा जंगल 'हुआ-हुआ' के शोर में डूब जाता है। ;क्या हुआ ?यह किसी को नहीं मालूम !

मंगलवार, 17 जनवरी 2017



कालाधन सफ़ेद हो गया मोदी जी आपकी भूलों से।

जीडीपी घट गई डालर  हुआ महँगा आपकी भूलों से।।


अच्छे दिन आ नहीं सकते कभी,चुनावी जुमलों से।

खुशबु आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से।।

सोमवार, 16 जनवरी 2017


 अंततः चुनाव आयोग ने  टूटी-फूटी साइकिल अखिलेश को देकर यूपी की राजनीति को सही और सकारात्मक  दिशा दी है.चुनाव आयोग ने लोकतंत्र का तकाजा और वक्त की पुकार सुनी, इसके लिए शुक्रिया !

अखिलेश यादव को चाहिए कि साइकिल की 'ओवर हॉलिंग' करते हुए उसे जतन से चलाये,जात -पाँत और धर्म-मजहब से दूरी बनाये। सपा को चाहिए कि फौरन वामपंथ,कांग्रेस तथा तमाम धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ एकजुटता बनाकर आगामी चुनाव जीतकर यूपी को 'बहिनजी' और 'भाईजी ' जैसे ढपोरशंखियों'से बचाये।

शनिवार, 14 जनवरी 2017

हिंसक परम्परा के लोग इन दिनों ज्यादा खूंखार हो चले हैं



संसदीय लोकतंत्र में 'विचार' एवम 'व्यक्तित्व' को लेकर अपनी-अपनी पसन्द का अधिकार सभी को है।किसी को पूँजीवादी शोषण की व्यवस्था और उसके भृष्ट नेता पसन्द हैं ! किसी को भगतसिंह जैसे क्रांतिकारी और उनकी बोल्शेविक क्रांति की विचारधारा पसन्द है! किसीको महात्मा गाँधी और उनकी अहिंसावादी विचारधारा पसन्द है!लोकतंत्र का सिद्धांत है कि किसी खास विचारधारा अथवा व्यक्तित्व के अनुगमन पर जोर नहीं दिया जा सकता !
लेकिन संविधान और 'राष्ट्रनिर्माताओं' के प्रति सम्मान का भाव नितांत अनिवार्य है।जिस किसी को गाँधीसे परहेज है, वो ख़ुशी-ख़ुशी देश छोड़कर जा सकता है!देश विभाजन के समय जो गांधीजी से सहमत नहीं थे वे जिन्ना के साथ पाकिस्तान चले गए। जो गाँधीजी को पसन्द नहीं करते थे और पाकिस्तान भी नहीं जा सकते थे उनमे से एक ने गांधीजी को मार डाला था । उसी हिंसक परम्परा के लोग इन दिनों ज्यादा खूंखार हो चले हैं ! यह फासिज्म की पगध्वनि है या सर्वनाश का संकेत ?  

साम्प्रदायिक तत्वों के अलावा ,गाँधीजी को नापसन्द करने वाले लोहियावादी,समाजवादी,जातिवादी फासीवादी और साम्यवादी भी हो सकते हैं। किन्तु 'संघनिष्ठों'के अलावा  कोई भी नहीं चाहता कि महात्मा गाँधी को 'राष्ट्रपिता' की पदवीसे अथवा राष्ट्रके प्रतीकोंसे बेदखल किया जाए !गाँधीजी का ट्रस्टीशिप सिद्धान्त ,पूँजीपतियों को उनका  आशीर्वाद ,उनका निरपेक्ष अहिंसावाद और उनकी रामराज्य वाली विचारधारा  केवल यूटोपिया ही है। फिर भी बापू जैसे भी थे महान थे। वे अपने दौर की दुनिया में सर्वश्रेष्ठ थे !उनके प्रति आदरभाव और कृतज्ञताभाव प्रत्येक भारतीय के लिए सौभाग्य  सूचक है !
  

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

जय आनंदम ,,,,,,,,!

मध्यप्रदेश के अधिकांस अखबारों में और टीवी चेनल्स पर 'विज्ञापन' के रूप में मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान की आकर्षक तस्वीरके साथ भावात्मक शब्दावली में उनकी एक विशिष्ठ 'अपील' प्रकाशित हुई है। कुल जमा दस लाइनों के विज्ञापन का सार यह है कि ''जरुरतमंद की सहायता करना पूण्य का कार्य है और १४ जनवरी-२०१७, मकर संक्रांति के पावन अवसर पर 'आनंदम' की अवधारणा का माननीय मुख्यमंत्रीजी  शुभारम्भ कर रहे हैं ''!इस विज्ञापन को जिस किसी ने देखा हो वह अंतिम लाइन पर गौर फरमाएं ' आइये 'आनंदम' को सफल बनाने में अपना योगदान करें '!आनंदम कोई भौतिक रूप आकर की वस्तु तो है नहीं कि आदान-प्रदान की जा सके। वैसे भी मध्यप्रदेश की जनता ने विगत ११ साल से अपने मताधिकार का प्रयोग करके 'शिव परिवार' और संघ परिवार को केवल 'आनंदम 'ही तो दिया है। रहा सवाल सरकार द्वारा जनता को 'आनंदम लौटाने का तो 'नोटबंदी'और व्यापम जैसे बहुत से लड्डू हैं जो सरकार ने जनता को दिए हैं। ये बात जुदा है कि आम जनता इन अच्छे दिनों के लड्डुओं को न  निगल पा रही है, न उगल पा रही है।  जय आनंदम !

माननीय शिवराजसिंह जी यशश्वी हों! दीर्घायु हों ! मकर संक्रांति की कोटिक शुभकामनाएं !वे अपने इस गुरुतर कार्य याने 'आनंदम' के कार्यान्वन में सफल हों !हालाँकि अभी यह जाहिर नहीं किया गया कि इस मद में सरकार कितना खर्च करने जा रही है।  यह कहना भी मुश्किल है कि इस 'आनदंम' रुपी अभियान का 'पुण्यफल' कौन - कौन खायेगा ? भाजपा और संघ परिवार तो पहलेसे ही चकाचक पूर्णआनंदमय हैं । किन्तु यदि मध्य प्रदेशके नंगे  -भूंखे लाखों बेघर सर्वहारा इस वक्त कड़कड़ाती ठण्ड में  तत्काल एक-एक कम्बल और एक-एक सस्ता स्वेटर भी पा जाएँ तो उन्हें असीम 'आनंदम' की प्राप्ति होगी !माननीय मुख्यमंत्री जी को 'पुण्यफल' अवश्य मिलेगा! कुछ  'आनंदम' उनकी पार्टी को भी प्राप्त होगा !

हालाँकि ''आनंदम' का यह महत कार्य स्वतःस्फूर्त रूप से  'Anandamindore' नामक संस्था  विगत ६-७ सालसे निरन्तर कर रही है। बिना किसी सरकारी मदद के ,बिना किसी देशी-विदेशी चन्दे के,बिना किसी तरह के प्रचार और ढिंढोरा पीटे सिर्फ सदस्यों के ऐच्छिक सहयोग से उनके नियमित योगदान से आनंदम इंदौर ने अनेक कीर्तिमान अर्जित किये हैं !

''आनंदम' की इस महती अवधारणा को इंदौर के सीनियर सिटीजन्स बहुत पहले ही ह्र्दयगम्य कर चुके हैं। मुझे गर्व है कि मैं स्वयं इस महान संस्था से जुड़ा हूँ। माननीय मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंहजी को शायद मालूम न हो कि 'आनंदम' की इस अवधारणा को व्यापक रूप प्रदान करने में आनंदम इंदौर के साथी [सीनियर सिटीजन्स ] बहुत आगे हैं। उनके सूचनार्थ आनंदम इंदौर द्वारा किये जाने वाले कुछ कार्यों का ब्योरा इस प्रकार है :-

१-आनंदम इंदौर द्वारा वेरोजगार  निराश्रित महिलाओं को 'मा शारदा मठ ' के सहयोग से स्वरोजगार और कुटीर उद्द्योग का प्रशिक्षण दिया जाता है। उन्हें यथासम्भव सिलाई मशीन ,और अन्य उपकरणों की निशुल्क आपूर्ति भी यथासम्भव की जाती है।

२-निर्धन -निराश्रित बच्चों ,रोजनदारी मजदूरों के बच्चों ,झुग्गी झोपड़ियों के रहवासी बच्चों  को निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था,यूनिफॉर्म,बुक्स और भोजन की व्यवस्था की जाती है।

३- जिस क्षेत्र में आनंदम [स्कीम-७४ विजयनगर,इंदौर] ट्रस्ट ने किराये का भवन ले रखा है ,उस क्षेत्र में समुचित साफ़ सफाई की निगरानी ,सार्वजनिक जागरूकता और नैतिक सजगता के लिए आनंदम इंदौर की सक्रिय है  !

४- आनंदम के अधिकांस सदस्य 'सीनियर सिटीजन्स' ही हैं।  अधिकांस के पुत्र-पुत्रियाँ  बाहर हैं। कुछ के तो विदेश में ही बस चुके हैं ,आनंदम इंदौर द्वारा सभीको बेहतर जीवन जीने का उचित  मार्गदर्शन मिलता है।

५-सभी आनंदम सदस्यों का 'जन्मदिन' संस्थागत रूप से और शानदार ढंग से मनाया जाता है। आनंदम में ५५ से ९२ वर्ष तक की आयु के सदस्य हैं ,आनंदम में सभी बुजुर्ग सदस्यों को युवाओं जैसा प्रोत्साहन मिलता है। कोई भी अपने आपको कभी भी अकेला महसूस नहीं करता !

६-आनंदम के सदस्यों में कुछ सेवानिवृत उच्चाधिकारी भी हैं ,वे सभी अपने हुनर और काबिलियत से देश के बड़े-बड़े डॉक्टर्स को हर महीने 'आनंदम' बुलाते हैं। अभी तक मेदान्ता के डॉ नरेश त्रेहन,अपोलो के डॉ प्रताप रेड्डी ,डॉ रावल और विभिन्न मर्ज के विशेषज्ञ नामचीन्ह डॉक्टर्स ने  'आनंदम'के सदस्यों को अपनी सेवाएं 'मुफ्त' में प्रदान की हैं। मेदांता,अपोलो और कनक जैसे कई हॉस्पिटल्स हैं ,जिनके बेहतरीन डॉक्टर्स आनंदम इंदौर को यथासम्भव सहयोग कर रहे हैं।

७ - सीनियर सिटीजन्स द्वारा स्थापित और उन्ही के द्वारा संचालित आनंदम इंदौर में हर माह कथा -कविता-कहानी और साहित्यिक गतिविधियों का आयोजन नियमित होता रहता है। यहाँ एक लायब्रेरी भी है।

८- आनंदम इंदौर में भजनसन्ध्या , ध्यान योग ,ज्ञानामृत सत्संग,फिजिकल फिटनेस बावत योगा और बुर्जगों के लिए शतरंज इत्यादि खेलों की भी व्यवस्था है।

९- आनंदम इंदौर द्वारा महीने में एक बार गीत -संगीत निशा का शानदार आयोजन हुआ करता है। हर धर्म-मजहब का प्रत्येक त्यौहार यहाँ हर्ष उल्लाश से मनाया जाता है।

१०- आनंदम इंदौर द्वारा तीर्थाटन और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों के निमित्त टूर  आयोजन भी किये जाते हैं।


मुख्यमंत्री जी ने आनंदम इंदौर का नाम तो  लपक लिया  किन्तु वे इस महत कार्य में कैसे सफल होंगे इसका कोई स्पष्ट प्रारूप उनके विज्ञापन में नहीं है। केवल संकल्प और भावनाओं के उदगार से कोई प्रयोजन सफल नहीं हो सकता। उसके लिए सही मार्गदर्शन और अनभव की आवश्यकता होती है। एमपी गवर्मेंट यदि चाहे तो आनंदम इंदौर उनकी पर्याप्त मदद कर सकता  है। यदि मन्शा और लगन सच्ची हो तो ''Anandamindore'के अध्यक्ष  श्री नरेन्द्रसिंह जी [सेवानिवृत एक्साइज कमिश्नर] और सचिव कैलाशचन्द पाठक जी एवम अन्य पदाधिकारियों से संपर्क किया जा सकता है !

बहरहाल प्रस्तुत विज्ञापन की भाषा से तो ऐंसा प्रतीत होता है कि मुख्यममंत्री जी का सूचना -प्रसारण मंत्रालय यह नहीं जानता कि मध्यप्रदेश में कौन कहाँ क्या कर रहा है ?याने सरकारभी अपने दायित्वका सही निर्वहन नहीं कर  रही  है।  जय आनंदम ,,,,,,! श्रीराम तिवारी !

बुधवार, 11 जनवरी 2017

देशभक्त फौजियों- किसान मजदूर तुम्हारे साथ है।

पाकपरस्त आतंकियों ने उड़ी ,उधमपुर और अन्य भारतीय सैन्य प्रतिष्ठानों पर छुपकर हमले किये हैं और उनके हमले अब भी जारी हैं। भारत के फौजी जवान रोज 'शहीद' हो रहे हैं। लेकिन सर्वाधिक शर्मनाक स्थिति वह है जब सीमा पर हमारे फौजी जवान भूँखे प्यासे बिना लडे ही मर रहे हों ! कुछ फौजी अफसर ,नेता और बिचोलिये किस कदर भृष्टाचार में लिप्त हैं यह आगस्ता हेलीकाप्टर काण्ड से बखूबी समझा जा सकता है। भारतीय फ़ौजमें कतिपयअधिकारी वर्ग द्वारा बीबियों की अदलाबदली के चर्चे पहले भी सुने जाते रहे हैं ,किन्तु वर्तमान तेवर क्या हैं यह इंदौर -महू के भुक्तभोगी अच्छी तरह जानते हैं। बुन्देली कहावत है ''धन्य कुची तारो ,बिलैया लेगई पारो !''

चीन-पाकिस्तान की  बॉर्डर पर अपना शौर्य  दिखाने के बजाय महू आर्मी के प्रशिक्षु अधिकारी शराबखोरी और आदतन -निर्दोष नागरिकों को पीटने के लिए मशहूर रहे हैं। वे लड़कियों और ओरतों को छेड़ते हैं ,यदि पुलिस और नागरिक कुछ आपत्ति करें तो 'विजयनगर थाने' की ऐंसी तैसी कर देते हैं। अभी तक तो इंदौर की जनता ने वर्तमान सैन्य बलों का यही शौर्य देखा है।जिन लोगों ने  १९६२-१९६५और १९७१ के जाबांज फौजियों को देखा है , उनके शौर्य को देखा है,वेमौजूदा हालात से दुखी हैं।

वर्तमान में भारतीय सैन्यबलों की हालात अत्यंत दयनीय है। उन्हें भरपेट खाना नहीं मिल रहा है।उन्हें अधपेट रहकर सीमाओं पर दुश्मन से लड़ना पड़ता है और अपने अफसरों के जूते पालिस से लेकर उनके कुत्तेकी सेवा तक करनी पड़ती है। जब वे शोषित -पीड़ित फौजी अपनी आपबीती फेसबुक या वाट्सएप पर भेजते हैं तो उनके मोबाइल छीन लिए जाते हैं। कोर्ट मार्शल की धमकी दी जाती है। एक तरफ तो पीएम साहब  खुद ही डिजिटल इंडिया की बात करते हैं और  कहते हैं कि हर काम के लिए मोबाइल का उपयोग करो। दूसरी तरफ देश केही जांबाज फौजियों  को उस सुविधा से वंचित किया जा रहा है। अपनी बदतर हालात को यदि किसी फौजी जवान ने अपने बीबी बच्चों को बता दिया तो उसपर इतना आतंक क्यों फैलाया जा रहा है। ढंग का खाना नहीं मिलने की शिकायत ही तो की है। उसकी शिकायत भी सही है उसमें शक की गुंजायश क्या है ? कौन नहीं जानता कि सेना  के हिस्से का अधिकांस खादयान्न और अन्य सन्साधन ब्लेक मार्केट में बेचे जाते हैं। यदि किसी फौजी जवान ने  'अंदर की पोल ' खोल दी तो 'नकली देशभक्तों' की उथली देशभक्ति पर पाला क्यों पड़ गया है ? शिकायतकर्ता फौजी जवान का स्थानांतरण क्यों किया ? कार्यक्षेत्र क्यों बदल दिया ? फौजी अफसरों और गुनहगार नेताओं पर ठोस कार्यवाही क्यों नहीं की जाती ? देशभक्त फौजियों ! आप अपने हक़ के लिए ,अपने सम्मान के लिए, अपनी आवाज बुलन्द करो- देश की मेहनतकश जनता और किसान मजदूर तुम्हारे साथ है।

भारत के कुछ दकियानूसी फेस बुकिये ,कुछ अगड़म-बगड़म पत्रकार और उथले साम्प्रदायिक नेता बात-बात में 'गांधी' शब्द से चिढ़ते हैं। जो लोग अपने बाप को बाप नहीं मानते वे ,महात्मा गाँधी याने बापू को 'राष्ट्रपिता' क्यों मानेगे ?  हरियाणा के कुख्यात मंत्री अनिल बिजने स्वीकार किया कि भविष्य में नोटों पर 'गाँधी' नहीं होंगे !उनके इस कथन पर गाँधीजी के प्रपौत्र की प्रतिक्रिया काबिले गौर है ! उनका सुझाव है 'चूँकि इस दौरमें वैसेभी नोटबंदी के बहाने बापूके चित्रकी दुर्गति हो रहीहै इसलिए आइंदा नए नोटों पर बापूका नाम और चित्र न छापा जाए बल्कि किसी 'महाभृष्ट नेता' का नाम और फोटो छापा जाए। देश की जनता को मालूम हो कि 'बापू' के हत्यारों के वंशज परवान चढ़ रहे हैं।  रिजर्व बैंक की स्वायत्तता खत्म हो चुकी है। अब संसदीय लोकतंत्र की नाक भाइयो -बहिनों के हाथ में है ! 

सोमवार, 2 जनवरी 2017

नोटबंदी से सिर्फ भाजपा को फायदा !


उत्तर प्रदेश में 'समाजवाद' सिर्फ एक परिवार विशेष तक सीमित रह गया था. अब 'सपा' के अंदर जो कुछ हो रहा है  ,वह 'समाजवाद' की ऐंसी -तैसी करने के लिए काफी है। वैसे भी इस 'कुनबा' समाजवाद से यूपी अथवा देश को कोई उम्मीद नहीं थी ! यदि आज अखिलेश के साथ पार्टी का बहुमत है तो भी वे उस गुनाह से नहीं बच सकते जो उन्होंने और उनके प्रिय काका रामगोपाल ने 'अवैध' अधिवेशन बुलाकर किया है। भले ही मुलायम अब अकेले हैं,किन्तु यूपी की जनता और समाजवादी आंदोलन के समर्थक  यह कभी नहीं भूल सकते कि अतीत में 'समाजवाद'के लिए मुलायमसिंह ने 'संघर्ष' का शानदार इतिहास लिखा है।

यह अकाट्य सत्य है कि 'नोटबंदी' से देश को एक रूपये का भी फायदा नहीं हुआ और न आइंदा होगा,किन्तु यह भी अटल सत्य है कि यूपी विधान सभा में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलने जा रहा है।जो लोग मोदी जी की नीतियों के खिलाफ हैं और निरंतर आलोचना कर रहे हैं,वे यह नोट कर लें कि देशकी जनता  'नोटबन्दी' के खिलाफ नहीं है।  इंडिया टुडे के एक्सिस ओपिनियन पोल के अनुसार यूपी में  भाजपा को स्पष्ट बहुमत [२०६ -२१६] सीट् मिल रही हैं। दूसरे नंबर पर सपाको १०० से कम सीट मिलने वाली है। तीसरे नम्बर पर 'बहिनजी'का कुनबा होगा ,उन्हें सिर्फ ६०-६५ सीट मिलेंगी। बाकी पार्टियों का पाटिया उलाल होने जा रहा है। हालाँकि मुख्यमंत्री के रूप में अभी भी अखिलेश यादव पहले नम्बर पर बने हुए हैं,किन्तु उनका 'यादवी कुल कलह'से उबर पाना मुश्किल है। यदि इंडिया टुडे का एक्सिस पोल सही सावित होता है तो बाकी के राज्यों में भी भाजपा को सफलता मिल सकती है। इसका असर आगामी २०१९ के लोक सभा चुनाव पर पढ़ेगा।  यदि इण्डिया टुडे का एक्सिस पोल गलत सावित हो भी जाए तो भी यह सौ फीसदी सच है कि पीएम मोदी के व्यक्तिगत आकर्षण और वोट बैंक पर कोई नकारात्मक प्रभाव नही पड़ा है। उनके द्वारा लगातार गलत निर्णय लेने के वावजूद ,लोगों को तकलीफ होने के वावजूद,कतार में मर जाने के वावजूद वांछित जनाक्रोश का अतापता नहीं है। मैंने स्वयम व्यक्तिगत तौर पर नोटबंदी पर विभिन्न लोगों से उनका अभिमत पूँछा ,अधिकांस का जबाब एक समान था 'देश के लिए थोड़ी तकलीफ तो चलती है !

चुनाव में 'धर्म' ,जाति और सम्प्रदाय पर  सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से भाजपा को कोई फर्क नहीं पडेगा।क्योंकि मोदी जी जबसे पीएम बनेहैं उन्होंने कभी अच्छे दिनों का वादा किया ,कभी विकास का वादा किया ,कभी कालेधन और नोटबंदी का नाटक किया उन्हें सुप्रीम कोर्ट के वर्डिक से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। क्योंकि सपा और बहिनजी की कृपा से यूपी में अधिकान्स हिन्दू वोट भाजपा की ओर ध्रुवीकृत हो चुका है। यूपी की जनता ने बिहार से अलग स्टेण्ड ले लिया है। एमपी में नोटबंदी से किसान बरबाद हो गए ,छग -रायपुर के किसान मुफ्त में सब्जी लुटा रहे हैं राजस्थान,गुजरात में हाहाकार मची है ,किन्तु हरजगह उपचुनाव और स्थानीय निकायों में भाजपा जीत रही है। विपक्ष ने नोटबंदी का पुरजोर विरोध किया ,मोदी सरकार की गलत नीतियों का खूब जमकर विरोध किया किन्तु जनता का एक बड़ा हिस्सा अभी भी मोदी के साथ है। आगामी २०१९ के लोक सभा चुनाव के बाद भाजपा को शिवसेना की जरूरत नहीं होगी। देश की अधिकांस जनता को  विपक्ष पर विश्वास नहीं है। यह आकलन इंडिया टुडे द्वारा किये गए एक्सिस पोल की वजह से नहीं है ,बल्कि सपा,बहिनजी तृणमूल तथा अन्य पार्टियों की पतली हालत देखकर कोई भी इस सिथति को समझ सकता है।