संसदीय लोकतंत्र में 'विचार' एवम 'व्यक्तित्व' को लेकर अपनी-अपनी पसन्द का अधिकार सभी को है।किसी को पूँजीवादी शोषण की व्यवस्था और उसके भृष्ट नेता पसन्द हैं ! किसी को भगतसिंह जैसे क्रांतिकारी और उनकी बोल्शेविक क्रांति की विचारधारा पसन्द है! किसीको महात्मा गाँधी और उनकी अहिंसावादी विचारधारा पसन्द है!लोकतंत्र का सिद्धांत है कि किसी खास विचारधारा अथवा व्यक्तित्व के अनुगमन पर जोर नहीं दिया जा सकता !
लेकिन संविधान और 'राष्ट्रनिर्माताओं' के प्रति सम्मान का भाव नितांत अनिवार्य है।जिस किसी को गाँधीसे परहेज है, वो ख़ुशी-ख़ुशी देश छोड़कर जा सकता है!देश विभाजन के समय जो गांधीजी से सहमत नहीं थे वे जिन्ना के साथ पाकिस्तान चले गए। जो गाँधीजी को पसन्द नहीं करते थे और पाकिस्तान भी नहीं जा सकते थे उनमे से एक ने गांधीजी को मार डाला था । उसी हिंसक परम्परा के लोग इन दिनों ज्यादा खूंखार हो चले हैं ! यह फासिज्म की पगध्वनि है या सर्वनाश का संकेत ?
साम्प्रदायिक तत्वों के अलावा ,गाँधीजी को नापसन्द करने वाले लोहियावादी,समाजवादी,जातिवादी फासीवादी और साम्यवादी भी हो सकते हैं। किन्तु 'संघनिष्ठों'के अलावा कोई भी नहीं चाहता कि महात्मा गाँधी को 'राष्ट्रपिता' की पदवीसे अथवा राष्ट्रके प्रतीकोंसे बेदखल किया जाए !गाँधीजी का ट्रस्टीशिप सिद्धान्त ,पूँजीपतियों को उनका आशीर्वाद ,उनका निरपेक्ष अहिंसावाद और उनकी रामराज्य वाली विचारधारा केवल यूटोपिया ही है। फिर भी बापू जैसे भी थे महान थे। वे अपने दौर की दुनिया में सर्वश्रेष्ठ थे !उनके प्रति आदरभाव और कृतज्ञताभाव प्रत्येक भारतीय के लिए सौभाग्य सूचक है !

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