यदि आप देशभक्त हैं ,राष्ट्रवादी हैं तो यह देश के लिए गौरव की बात है। लेकिन उसके प्रदर्शन के लिए किसी कालेज या विश्विद्यालय परिसर में जाकर हुड़दंग मचाने की जरूरत नहीं है। यदि आप अपने हिस्से का नागरिक दायित्व निर्वहन करते हैं तो देश यों ही मान लेगा कि आप 'देशभक्त' हैं। यदि किसी अहमक को अपनी देशभक्ति प्रदर्शन की ज्यादा ही खुजाल है तो वह कश्मीरी पत्थरबाजों और उन पाकिस्तानी एजेंटों से क्यों नहीं लड़ता जो भाजपा के पदाधिकारी सहित एम.पी में धरा गए हैं? देशभक्ति दिखाना है तो किसी दुश्मन देश पर में घुसकर आक्रमण क्यों नहीं करते ? जिस लड़की ने देशके लिए अपना पिता खोया, उसे वे निकृष्ट लोग देशभक्ति सिखा रहे हैं ,जिन लोगों ने देश के लिए अंगुली भी नहीं कटाई ! वैसे प्यार मोहब्बत से देशभक्ति सिखाना बुरी बात नहीं लेकिन 'रेप'की धमकी देने वाले यदि देशभक्त होते हैं तो ऐंसी देशभक्ति को दूर से ही नमस्कार !
मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017
रविवार, 26 फ़रवरी 2017
वोटर को दोष देना उचित नहीं है ।
''साहब , अाज समास्या यह हे कि व्यक्ति दौ-मुहाँ हो गया हे , जब खुद के अधिकारो की बात अाती हे सरकारी कार्मचारियो के सन्दर्भ मे तो उसे कम्युनिस्ट पार्टी से प्रेम होता हे , लेकिन वही व्यक्ति जब वोट देने बुथ पर जाता हे तो उसकी प्रतिब्धता बदल जाती हे ? यह विचारणीय अौर हास्यास्पद नही हे क्या ?''
उक्त त्रुटिपूर्ण अनगढ़ वाक्यांश श्री 'रिज़ खान' साहब की उस टिप्पणी से उद्धृत किया गया है जो उन्होंने मेरी एक पोस्ट के सन्दर्भ में की है। उनके उक्त वाक्यांश को पढ़ने से लगता है कि उन्होंने तमाम भारतीय मतदाताओं को 'दोमुहाँ' कहा है। मैं उक्त शब्द चयन की भर्त्सना करता हूँ। वैसे कोई परिपक्व वामपंथी व्यक्ति इस तरह की शब्दावली का प्रयोग नहीं करता। लेकिन रिज़ खान ने सवाल सही उठाया है। हालांकि यह सवाल बहुत पहले सीपीएम के वरिष्ठ कामरेड स्वर्गीय आर उमानाथ ने ,लगभग ३० साल पहले एआईआईईए के अखिल भारतीय मद्रास अधिवेशन में उठाया था।
कामरेड आर उमानाथ का सवाल था की ''संगठित क्षेत्र के मजदूर/कर्मचारी /अधिकारी एकजुट होकर अपने वेतन भत्ते बढ़वाने के लिए तो लाल झण्डा हाथ में लेकर 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा लगाते हैं ,हड़ताल में भी शामिल होते हैं ,सरकार की आलोचना करते हैं ,किन्तु जब कभी आम चुनाव होते हैं तो वे कम्युनिस्ट पार्टियों को वोट नहीं करते।''सभी जानते हैं कि यही वर्ग चेतना का संकट है। जब मजदूर-किसान के अपने हितों पर संकट आया तो 'लाल सलाम' बोलने लगे .और जब मतलब निकल गया तो पूँजीवादी ,साम्प्रदायिक और क्षेत्रीय पार्टियों को वोट दे आये।
५०-६० साल पहले के ज़माने में मुंबई , इंदौर,कानपुर, अहमदाबाद , हैदराबाद और बेंगलोर की सड़कों पर लाल झंडाही लहराता था। ट्रेड यूनियन आंदोलन की ताकत इतनी थी कि उन पर फिल्में भी बना करतीं थीं। उस ज़माने में भी सारे मजदूर-किसान वामपंथ को वोट नहीं दे पाते थे। वर्ग चेतना का उचित विकास न होने से या वामपंथ का उम्मीदवार न होने से वे कहीं पर बाल ठाकरे की शिवसेनाको ,कहीं पर दत्ता सामन्त की यूनियनको, कहीं पर किसान नेता शरद जोशी के शेतकरी संघटना को ,कहीं पर तेलगुदेशम को ,कहीं पर मुस्लिम लीग को , कहीं पर द्रमुक को ,कहीं पर जनसंघ को और कहीं पर कांग्रेस को वोट दिया करते थे। किन्तु अंतर्राष्टीय परिदृश्य में सोवियत पराभव और भारत में साम्प्रदायिक ,मजहबी उन्माद के कारण वामपंथ को जबरजस्त धक्का लगा है। जातीयतावाद ,क्षेत्रियतावादी और नव्य पूँजीवाद ने आधुनिक युवाओं को विचारधारा विमुख कर दिया है। वामपंथ ने भी देश काल के प्रतिकूल गंभीर भूलें कीं हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों में आजादी के बाद अब तक १० बार विभाजन हो चुका है। नक्सलवाद -संशोधनवाद ने तो वामपंथ का कबाड़ा किया ही है।किन्तु कुछ खास वामपंथी नेताओं के अहंकार ने भी भारत में वामपंथ को बहुत नुकसान पहुंचाया है। यदि उम्मीदवार ही खड़ा नहीं करेंगे तो मतदाता चाहे मजूर हो या किसान हो वोट तो देगा। अब वो किसे देता है यह उसके स्थानीय सरोकारों,धर्म,जात और क्षेत्र भाषा पर निर्भर है। भारतीय राजनीति की यह अयाचित बुराई है। कोई पसन्द करे या न करे। इसलिए किसी भी तरह से वोटर को दोष देना उचित नहीं है । श्रीराम तिवारी !
उक्त त्रुटिपूर्ण अनगढ़ वाक्यांश श्री 'रिज़ खान' साहब की उस टिप्पणी से उद्धृत किया गया है जो उन्होंने मेरी एक पोस्ट के सन्दर्भ में की है। उनके उक्त वाक्यांश को पढ़ने से लगता है कि उन्होंने तमाम भारतीय मतदाताओं को 'दोमुहाँ' कहा है। मैं उक्त शब्द चयन की भर्त्सना करता हूँ। वैसे कोई परिपक्व वामपंथी व्यक्ति इस तरह की शब्दावली का प्रयोग नहीं करता। लेकिन रिज़ खान ने सवाल सही उठाया है। हालांकि यह सवाल बहुत पहले सीपीएम के वरिष्ठ कामरेड स्वर्गीय आर उमानाथ ने ,लगभग ३० साल पहले एआईआईईए के अखिल भारतीय मद्रास अधिवेशन में उठाया था।
कामरेड आर उमानाथ का सवाल था की ''संगठित क्षेत्र के मजदूर/कर्मचारी /अधिकारी एकजुट होकर अपने वेतन भत्ते बढ़वाने के लिए तो लाल झण्डा हाथ में लेकर 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा लगाते हैं ,हड़ताल में भी शामिल होते हैं ,सरकार की आलोचना करते हैं ,किन्तु जब कभी आम चुनाव होते हैं तो वे कम्युनिस्ट पार्टियों को वोट नहीं करते।''सभी जानते हैं कि यही वर्ग चेतना का संकट है। जब मजदूर-किसान के अपने हितों पर संकट आया तो 'लाल सलाम' बोलने लगे .और जब मतलब निकल गया तो पूँजीवादी ,साम्प्रदायिक और क्षेत्रीय पार्टियों को वोट दे आये।
५०-६० साल पहले के ज़माने में मुंबई , इंदौर,कानपुर, अहमदाबाद , हैदराबाद और बेंगलोर की सड़कों पर लाल झंडाही लहराता था। ट्रेड यूनियन आंदोलन की ताकत इतनी थी कि उन पर फिल्में भी बना करतीं थीं। उस ज़माने में भी सारे मजदूर-किसान वामपंथ को वोट नहीं दे पाते थे। वर्ग चेतना का उचित विकास न होने से या वामपंथ का उम्मीदवार न होने से वे कहीं पर बाल ठाकरे की शिवसेनाको ,कहीं पर दत्ता सामन्त की यूनियनको, कहीं पर किसान नेता शरद जोशी के शेतकरी संघटना को ,कहीं पर तेलगुदेशम को ,कहीं पर मुस्लिम लीग को , कहीं पर द्रमुक को ,कहीं पर जनसंघ को और कहीं पर कांग्रेस को वोट दिया करते थे। किन्तु अंतर्राष्टीय परिदृश्य में सोवियत पराभव और भारत में साम्प्रदायिक ,मजहबी उन्माद के कारण वामपंथ को जबरजस्त धक्का लगा है। जातीयतावाद ,क्षेत्रियतावादी और नव्य पूँजीवाद ने आधुनिक युवाओं को विचारधारा विमुख कर दिया है। वामपंथ ने भी देश काल के प्रतिकूल गंभीर भूलें कीं हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों में आजादी के बाद अब तक १० बार विभाजन हो चुका है। नक्सलवाद -संशोधनवाद ने तो वामपंथ का कबाड़ा किया ही है।किन्तु कुछ खास वामपंथी नेताओं के अहंकार ने भी भारत में वामपंथ को बहुत नुकसान पहुंचाया है। यदि उम्मीदवार ही खड़ा नहीं करेंगे तो मतदाता चाहे मजूर हो या किसान हो वोट तो देगा। अब वो किसे देता है यह उसके स्थानीय सरोकारों,धर्म,जात और क्षेत्र भाषा पर निर्भर है। भारतीय राजनीति की यह अयाचित बुराई है। कोई पसन्द करे या न करे। इसलिए किसी भी तरह से वोटर को दोष देना उचित नहीं है । श्रीराम तिवारी !
मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017
यूपी में सही विकल्प मौजूद ही नहीं है !
यू,पी ,बिहार,एमपी,हरियाणा जैसे हिंदी भाषी प्रान्तों के आधुनिक पतनशील राजनैतिक तंत्र को देख सुनकर जिस किसी का मन बाकई दुखी होता हो, जिन्हें यह भ्रम हो कि राजनीति में चारित्रिक पतन सिर्फ इस दौर का ही विशिष्ठ गुण है ,वे महान व्यंग सम्राट श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास 'राग दरवारी'अवश्य पढ़े। जिन्हें यह आभास हो रहा हो कि राजनीति के कारण यूपी, बिहार,पंजाब,हरियाणा का अधम चारित्रिक पतन हो चुका है वे उस पुस्तक को अवश्य पढ़ें। जिन्होंने 'राग दरबारी' पढ़ा है वे बखूबी जानते हैं कि न केवल यूपी बिहार बल्कि लगभग पूरा देश ही 'शिवपालगंज' हो चुका है। पचास साल पहले लिखे गए उपन्यास 'राग दरबारी' के पात्रों का चरित्र भी वर्तमान लुच्चों, लफंगों,,गुंडों ,दवंगों ,मुन्ना भाइयों,और सत्ता के दलालों से कमतर नहीं था। वास्तव में पार्टियों या नेताओं ने नहीं बल्कि अशिक्षित उज्जड समाजों के भेड़िया धसान चरित्र ने उत्तर भारत की राजनीति को चरम पतन के खड्ड में धकेला है। सामंती कबीलाई समाज के रहन सहन,खान-पान,चाल -ढाल और पहनावे में फर्क आया है ,लेकिन सोच में कोई फर्क नहीं आया है। निहित स्वार्थी सामंती मानसिकता ही साम्प्रदायिक और जातीयतावादी चुनावी राजनीति की मददगार बनती है। इसी कारण भारत में विचार आधारित राजनीति को सफलता नहीं मिल पा रही है। कोई लेपटॉप मुफ्त देकर वोट हासिल करता है ,कोई जुमलों वादों से जीत हासिल करना चाहता है. कोई भृष्ट तरीके अपनाकर सत्ता सुख पाना चाहता है ,कोई आरक्षणकी वैशाखी पकड़कर, धर्म-मजहब की ढपली बजाकर राजनैतिक ताकत बढ़ाना चाहता है। कोई वैज्ञानिक विचारधारा आधारित सर्वहारा क्रांति का तलबगार है। बिकट हालात में देश की मेहनतकश आवाम को आर्थिक -सामाजिक बदलाव की कोई राह नजर नहीं आ रही ही।
''संगठित क्षेत्र के मजदूर/कर्मचारी /अधिकारी एकजुट होकर अपने वेतन भत्ते बढ़वाने के लिए तो लाल झण्डा हाथ में लेकर 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा लगाते हैं ,हड़ताल में भी शामिल होते हैं ,सरकार की आलोचना करते हैं ,किन्तु जब कभी आम चुनाव होते हैं तो वे कम्युनिस्ट पार्टियों[वामपंथ] को वोट नहीं करते।''सभी जानते हैं कि यह वर्ग चेतना का संकट है। जब मजदूर-किसान के अपने हितों पर संकट आया तो 'लाल सलाम' के नारे लगाने लगे .और जब मतलब निकल गया तो पूँजीवादी ,साम्प्रदायिक और क्षेत्रीय पार्टियों को वोट दे आये।
वेशक आधुनिक लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था यद्द्पि सामन्तवादी शासन व्यवस्था से बेहतर है,किन्तु चुनावी प्रक्रिया की खामियों और 'दुष्प्रचार'से भ्रमित मतदाता वास्तविक जनादेश नहीं दे पाते। भारत की चुनाव प्रक्रिया और प्रणाली दोनों हो दोषपूर्ण हैं। इस सिस्टम में इतने छेद हैं कि पता लगाना मुश्किल है कि देश के लिए मुफीद क्या है? और लोकतंत्र के लिए बाजिब क्या है? भारतीय राजनीति की तमाम विकृतियों के गढ़ उत्तरप्रदेश में हो रहे चुनावोंमें जो खास पार्टियाँ मैदान में हैं उनमें से दूधका धुला कोई नेता या दल नहीं है। भाजपा केवल मोदीके भरोसे है,मोदीजी फूहड़ राजनीति एवं काल्पनिक 'हिंदुत्व के भरोसे हैं। कांग्रेस केवल सपा और राहुल के भरोसे है। सपा अपने युवा नेता अखिलेश यादव और सत्ता के भरोसे है। अखिलेश यादव अपने 'दवँग परिवार' जातिवाद और अल्पसंख्यक वर्ग के भरोसे है। वसपा बहिन जी के भरोसे है। मायावतीजी दलित ,मुस्लिम और ब्राह्मण की सोशल इंजीनियरिंग के भरोसे हैं । इनमें कोई भी जीते ;हारना जनता को ही है !क्योंकि यूपी में सही विकल्प मौजूद ही नहीं है ! श्रीराम तिवारी
''संगठित क्षेत्र के मजदूर/कर्मचारी /अधिकारी एकजुट होकर अपने वेतन भत्ते बढ़वाने के लिए तो लाल झण्डा हाथ में लेकर 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा लगाते हैं ,हड़ताल में भी शामिल होते हैं ,सरकार की आलोचना करते हैं ,किन्तु जब कभी आम चुनाव होते हैं तो वे कम्युनिस्ट पार्टियों[वामपंथ] को वोट नहीं करते।''सभी जानते हैं कि यह वर्ग चेतना का संकट है। जब मजदूर-किसान के अपने हितों पर संकट आया तो 'लाल सलाम' के नारे लगाने लगे .और जब मतलब निकल गया तो पूँजीवादी ,साम्प्रदायिक और क्षेत्रीय पार्टियों को वोट दे आये।
वेशक आधुनिक लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था यद्द्पि सामन्तवादी शासन व्यवस्था से बेहतर है,किन्तु चुनावी प्रक्रिया की खामियों और 'दुष्प्रचार'से भ्रमित मतदाता वास्तविक जनादेश नहीं दे पाते। भारत की चुनाव प्रक्रिया और प्रणाली दोनों हो दोषपूर्ण हैं। इस सिस्टम में इतने छेद हैं कि पता लगाना मुश्किल है कि देश के लिए मुफीद क्या है? और लोकतंत्र के लिए बाजिब क्या है? भारतीय राजनीति की तमाम विकृतियों के गढ़ उत्तरप्रदेश में हो रहे चुनावोंमें जो खास पार्टियाँ मैदान में हैं उनमें से दूधका धुला कोई नेता या दल नहीं है। भाजपा केवल मोदीके भरोसे है,मोदीजी फूहड़ राजनीति एवं काल्पनिक 'हिंदुत्व के भरोसे हैं। कांग्रेस केवल सपा और राहुल के भरोसे है। सपा अपने युवा नेता अखिलेश यादव और सत्ता के भरोसे है। अखिलेश यादव अपने 'दवँग परिवार' जातिवाद और अल्पसंख्यक वर्ग के भरोसे है। वसपा बहिन जी के भरोसे है। मायावतीजी दलित ,मुस्लिम और ब्राह्मण की सोशल इंजीनियरिंग के भरोसे हैं । इनमें कोई भी जीते ;हारना जनता को ही है !क्योंकि यूपी में सही विकल्प मौजूद ही नहीं है ! श्रीराम तिवारी
सभी मित्रों ,सपरिजनों ,बन्धु -बाँधवों और सुह्रदयजनों को अत्यंत दुःख के साथ सूचित किया जाता है कि मेरी अनुज बधु ,अनुज सीताराम तिवारी की धर्मपत्नी , शरद -उपमन्यु रूपेश तिवारी की माताजी एवम श्रीमती उर्मिला तिवारी की मौसेरी बहिन , श्रीमती सीमा तिवारी का विगत रात्रि को असामयिक दुखद निधन हो गया है,अश्रुपूरित श्रद्धांजलि !
शनिवार, 18 फ़रवरी 2017
जो शख्स आलोचना ,समालोचना और प्रत्यालोचना के अंतर को समझता है ,जिसका नजरिया प्रगतिशील और सोच 'साइन्टिफ़िक' है, उसके द्वारा सोशल मीडिया पर प्रस्तुत आलोचना सार्थक एवम तार्किक हुआ करती है। किन्तु जो लोग आलोच्य विषय में निष्णान्त नहीं हैं और बिना पढ़े ही नकारात्मक टिप्पणी करते रहते हैं ,उनकी मशक्कत निरर्थक है। जो लोग वैचारिक प्रतिबध्दता के वशीभूत इकतरफा और व्यक्तिगत अंध आलोचना में ही व्यस्त हैं ,वे ओसीडी [आफसेसिव कम्पलसिव डिसऑर्डर] से ग्रस्त हैं। ऐंसे लोगों से हमेशा बचना चाहिए !
गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017
शांत -खुशहाल पाकिस्तान ही भारत के लिए मुफीद है।
पाकिस्तान में एक हफ्ते में ५ वाँ आतंकी हमला !दरगाह में आईएस आतंकी ने खुद को उड़ाया! १०० मरे और १५० गंभीर रूप से घायल ! पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने कहा -'हर एक बूँद का बदला लिया जाएगा !' अखबार में इन पंक्तियों को पढ़ने की बाद ,मेरी पहली प्रतिक्रिया यही है कि 'दिवंगतों के प्रति शोक संवेदना प्रकट करता हूँ और आतंकवाद की निंदा करता हूँ !'बहुत सोचा लेकिन मुझ अल्पबुद्धि को कुछ समझ नहीं आया कि ये पाकिस्तानी जनरल किससे बदला लेने की बात कर रहा है ? यह तो वही बात हुई कि अपने बच्चों के हाथों में किताब कॉपी देने के बजाय पहले तो एके ४७ और क्लाशिनकोव पकड़ा दी ,और जब बच्चों ने घर में ही खून की होली खेलना शुरूं कर दिया तो बच्चों के अब्बा हुजूर पडोसी को गालियाँ देने लगे।
पाकिस्तानी हुक्मरानों की असल समस्या यह है कि उनसे अपना देश सम्भलता नही और वे दुनिया भर में आतंकबाद के निर्यात की तिजारत करने पर तुले हैं। यह उसी कट्टरतावाद का प्रतिफल है कि एक अकेले फिदायीन 'आईएसजादे'ने एक झटके में पूरे १०० हलाल कर दिए। पाकिस्तानी हुक्मरान और आतंकी इस नृशंस नरसंहार का ठीकरा भारत के सिर फोड़ देते लेकिन हमलावर की पहचान तुरन्त जाहिर हो गयी कि वह 'ईएस आई एस' का पट्ठा था। यह हमला सूफी सन्त की दरगाह पर हुआ है जो शियाओं के एक विशेष पर्व पर किया गया है। इस नर संहार पर जो लोग चुप हैं ,वे कौन हैं ?..वे कौन [जादे]कहे जाएंगे ? भारत के चप्पे -चप्पे में और कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकवादी रोज हमले कर रहे हैं ,किन्तु हमारे विद्वान साथी सिर्फ 'मोदी-मोदी'में पगला रहे हैं। वे पाकिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ एक शब्द भी खर्च नहीं करते।जब हरियाणा में 'रामजादों'द्वारा एक निर्दोष अखलाख को मारा,तब हमने जमकर कोसा था,अपने तमगे लौटा दिए थे। अब पाकिस्तान में एक अकेले ने ही १०० मार डाले,इस नर संहार की निंदा करने में क्या समस्या है ? भारत के धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी कहाँ हो ?
वह दिन दूर नहीं जब पाकिस्तान की राज्य सत्ता और एटामिक हथियारों के ज़खीरे पर दहशतगर्दों का कब्ज़ा होगा। नफ़रत और कट्टरता की बुनियाद पर बने इस देश का शायद यही हश्र होना था। पाकिस्तान की समस्या का हल दुनिया की किसी महाशक्ति के पास नहीं। चीन, रूस और अमेरिका की दिलचस्पी सिर्फ इस मरते देश की खाल नोच लेने भर में है। पाकिस्तान की मेहनतकश अमन पसन्द आवाम को इतना बुजदिल और कायर नहीं होना चाहिए कि आतंकियों के मजहबी लीडर खुले आम सड़कों पर हथियारों के साथ जुलुस या सभाएं करते रहें और आम आदमी तमाशा देखता रहे। पाकिस्तान के अमनपसन्द लोग चाहें तो पाकिस्तान में 'भारत विरोध' की उन्मादी लहरों को रोक सकते हैं। खूनी आतंक की इस समस्या को उन्हें गंभीरता से लेना ही होगा।भारत के जो लोग आतँकवाद से दहकते पाकिस्तान को देखकर पुलकित हो रहे हैं वे यदि अपने विवेक का उपयोग करेंगे तो पाएंगे कि एक शांत समृद्ध और खुशहाल पाकिस्तान ही भारत के लिए मुफीद है। यदि पड़ोस के घर में आग लगी हो तो चैन से कोई पागल ही सो सकता है। पाकिस्तान में उठ रही आतंकी आग की लपटें ,भारत को नहीं झुलस पाएंगीं ,इसकी क्या गांरटी है ? भारत का अभिन्न अंग जम्मू और कश्मीर तो १९४७ से ही सुलग रहा है।
पाकिस्तान में धधक रही मजहबी आतंक की आग को बुझाये बिना दक्षिण एशिया में स्थायी अमन का दूसरा कोई विकल्प नहीं। कट्टरतावादी उन्मादी आग को बुझा पाना अकेले पाकिस्तान के वश में नहीं है। यह आग तभी बुझ सकती है जब विश्व विरादरी यह कबूल करे कि इस आग को भड़काने में अमेरिका और चीन का विशेष हाथ है !आतंक के भुक्तभोगी भारत और अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के हुक्मरानों ने जो दुराभांति की उसका ही परिणाम है कि अब पाकिस्तान धधक रहा है । भारत अफगानिस्तान जैसे पड़ोसियों के आपसी सहयोग से ही यह आग बुझ सकती है !चीन अमेरिका और रूस के भरोसे पाकिस्तान विनाश की ओर बढ़ रहा है। हमें पाकिस्तान की बदतर स्थिति से खुश होने की कोई ज़रुरत नहीं,क्योंकि पाकिस्तान अगर जलेगा तो आँच भारत पर अवश्य आएगी। श्रीराम तिवारी
शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017
आत्मघाती नीतियों पर पुनर्विचार जरुरी है !
आधुनिक सामाजिक -आर्थिक जीवन उस दिशा में अग्रसर हो रहा है ,जिसकी सैद्धान्तिक भविष्यवाणियां मार्क्स-एंगेल्स ने कीं थीं। वैज्ञानिक-टेक्नॉलाजिकल और उन्नत सूचना संचार प्रौद्दोगिकी के चरम की ओर बढ़ते इंसान के कदम ,किसी मजबूत आधार पर नहीं टिके हैं।वेशक विज्ञान और टेक्नॉलॉजी ने विकास की असीम सम्भावनाएँ प्रकट कीं हैं।किन्तु विकसित पूँजीवादी देशों में 'आर्थिक मंदी' के खतरे साथ बेतहाशा बेरोजगारी भी बढ़ रही है। भारत जैसे विकासशील देश में बेरोजगारों की स्थिति पहले से ही भयानक है ,अर्थ व्यवस्था बेहद उलझी हुई है। केवल अशिक्षित अथवा अर्ध शिक्षित युवाओं को ही नहीं बल्कि उच्चशिक्षित तकनीकी ज्ञानसे समृद्ध युवा पीढी के बेरोजगारों को भी मजबूरन निजी क्षेत्रकी गुलामी करनी पड़ रही है। भुखमरी दूसरी सबसे बड़ी समस्या है ,तीसरी समस्या 'बेघर'लोगों की है , जो अपना सम्पूर्ण जीवन अभावों में गुजारने को बाध्य हैं। यह स्थिति केवल आधुनिक भारत की ही नहीं है। बल्कि कर्जखोर, मुनाफाखोर -विकसित पूँजीवादी दुनिया भी इस बीमारी से ग्रस्त है। बम्फर बेलआउट पैकेज और सब्सिडी के वावजूद यूरोप-अमेरिका की आर्थिक आपात स्थितिबेकाबू है। इसके वावजूद भारत के सत्तारूढ पूँजीवादी नेता इतिहास से सबक सीखने के बजाय उनकी ही घातक नीतियों का अंधानुकरण किये जा रहे हैं। वे आत्मघाती नीतियों पर पुनर्विचार के लिए बिलकुल तैयार नहीं हैं।चूँकि इस दौर के युवाओं को आर्थिक अध्यन में अधिक रूचि नहीं है , इसलिए वे स्वविवेक से महरूम होकर चुनावों के समय नेता विशेष के वाणी विलास पर रीझ जाते हैं। अपने जाति ,समाज,धर्म-मजहब के 'नेता' को हीरो मानकर ,अपना भविष्य उसके हवाले कर देते हैं जो अपने ईमान और कौल का पक्का नहीं है और खुद राजनीतिक मृग मरीचिका में जी रहा है।
ताजा खबर है कि कोई 'द वीक- हंसा ' ने मौजूदा विधान सभा चुनावों के लिए जनमत सर्वेक्षण किया है। 'द वीक - हंसा' के सर्वे में बताया गया है कि 'नोटबंदी' का इन चुनावों पर कोई प्रतिगामी असर नहीं पड़ने वाला । पंजाब को छोड़ बाकी अन्य चारों प्रान्तों में भाजपा के जीतने की प्रबल संभावनाएं बताईं गईं हैं। यदि सर्वे बाकई सच साबित हुआ ,तब भी मैं यही कहूँगा कि 'नोटबंदी' का फैसला एक अहमक और आत्मघाती फैसला था। वैसे पंजाब और यूपी के चुनावों पर देश दुनिया की नजर टिकी हुई है। अन्य राज्यों में तो चुनावी हार जीत के स्थानीय कारण ही मान्य होंगे। यूपी के चुनाव में यदि भाजपा की जीत हुई तो उसका श्रेय मोदीजी को मिलेगा। इससे फोकट के श्रेय से देश के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पडेगा। फोकट काश्रेय इसलिए कि कांग्रेस सपा,वसपा की हार के विश्लेषण कुछ इस तरह होंगे ! यह सच है कि यूपी में कांग्रेस और वामपंथ बहुत कमजोर हो चुके हैं। लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल भैया ने पीके की सलाह पर वसपा ,सपा के खिलाफ, खटिया आंदोलन चलाकर धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने जो भी किया वह सब सही था। लेकिन अल्पसंख्यक मतों के ध्रवीकरण को रोकने के लालचमें जब उन्होंने सपा[अखिलेश यादव] को गले लगाया तो मोदी जी के 'मन की बात' हो गई ! खुदा न खास्ता सपा +कांग्रेस यदि हार जाते हैं तो कहा जायेगा की 'यादव कुल कलह' ने डुबोया !यदि बहिनजी हारतीं हैं तो कहा जायेगा कि उनका 'नोटबन्दी'विरोध और जातीय उन्माद उन्हें ले डूबा !और भाजपा यदि जीत जाती है तो कहा जायेगा 'मोदी जी 'की नीतियों ने जितवा दिया। बाकीतो सब ठीकहै, लेकिन मोदी जी यदि यूपी में भाजपा को जिता ले गए तो मुल्क की खैर नहीं। क्योंकि उनकी नीतियों भारत को बरबादी की ओर ले जा रहीं हैं। इसलिए यूपी में भाजपा की हार यदि होती है तो यह देश हित में होगा।
कुछ 'देशभक्त' मित्रों और 'भाइयो-बहिनों' को यह जानकर दुःख होगा कि मोदी जी के ढाई साल के शासन काल में अब तक बहुत सी बातें 'पहली बार' हुईं हैं। उनमें से दो अभी ताजा घटनाएँ हैं। एक घटना हमारे मध्यप्रदेश की है। एमपी में अभी-अभी आधा दर्जन से अधिक पाकिस्तानी एजेंट्स पकडे गए हैं। उनके नाम 'दैनिक भास्कर' के अनुसार इस प्रकार हैं ;-सर्वश्री बलरामसिंह ,कुश पंडित ,कुँअर जितेंद्रसिंह ठाकुर ,रीतेश खुल्लर ,जीतेन्द्र यादव और त्रिलोक सिंह भदौरिया ! एक बन्दा तो देशभक्त पार्टी का स्थानीय पदाधिकारी बताया जा रहा है। नासमिटे कांग्रेसियों ने ७० साल में यह नहीं किया !और एक ख़ास बात, इस सूची में 'गद्दार कौम' का कोई बन्दा नहीं है ! 'भाइयों -बहिनों क्या बताऊँ ! कहीं इस 'पहली बार'की शर्मनाक घटना से कोई शर्म-हयादार 'देशभक्त' कहीं चुल्लू भर पानीमें डूबकर न मर जाए !
'भाइयों बहिनों' मोबाइल को कुछ देर के लिए स्विच ऑफ़ कीजिये !आँखे खोलकर ध्यान से कोई राष्ट्रीय अखबार पढ़िए ! भारत के नजदीक अरब की खाड़ी में पाकिस्तान नेवी द्वारा आयोजित युद्धाभ्यास 'अमन-१७' में दुनिया के ३७ देशों की नेवल फ़ोर्स एक साथ सामूहिक युद्धाभ्यास में जुटे हैं।ऐंसा 'पहली बार' हो रहा है कि दुनिया के प्रमुख ३७ देशों में मोदी मित्र 'ट्रम्प,शिंजो आबे ,पुतिन और शी जिन पिंग के देश अपने नेवल युद्धपोत लेकर भारत को धमकाने के लिए एकजुट हैं। निसन्देह यह 'पहली बार हो रहा है। मोदी सरकार की शानदार विदेश नीति और श्री धोवाल साहब का शानदार -जानदार व्यक्तित्व चारों खाने चित्त पड़े हैं। निसंदेह भारत असुरक्षित है,पहली बार ! मोदी सरकार की एक और उपलब्धि है जो 'पहली बार' प्राप्त हुई है ,कलेजा थामकर' नोट कीजिये ! हमारे बहुत से जाबांज फौजी इन दिनों फ़ौज की नौकरी छोड़ रहे हैं या फरार हो रहे हैं। यह टन्टा भी 'पहली बार' ही हो रहा है। इकबाल साहब की पंक्ति याद आ रही है ;-वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है ,,,,,,,,!
आधुनिक युवाओं को 'वैज्ञानिक कम्युनिज्म' तो बहुत बड़ी बात है, संसदीय लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों की भी जानकारी नहीं है। जब आधुनिक एमबीए,एमसीए और तमाम उच्च डिग्रीधारी युवाओंको ही नहीं मालूम कि कार्ल -मार्क्स कौन थे ? ऐतिहासिक द्वन्दात्मकता क्या है ? वर्गीय समाज में उत्पादन सम्बन्ध व उनके अन्तःसम्बन्ध क्या हैं ? ऐतिहासिक भौतिकवाद क्या है ? कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक 'डास केपिटल' में विस्तार से और 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो 'में सारतत्व के रूपमें इन तमाम विषयोंका वैज्ञानिक विश्लेषण किया है। फ्रांसीसी क्रांति और अक्टूबर क्रांति ने इन सिद्धान्तों और स्थापनाओं को मानवीय आधार उपलब्ध कराया। जन -समस्यायों के बरक्स वैज्ञानिक हल खोजे गए। लेकिन उन शिक्षाओं का समुचित अध्यन मार्क्सवादी ही नहीं करते तो लम्पट अपढ़ गंवार युवाओं से क्या उम्मीद करें ? भावजगत में पली बढ़ी और नैतिक रूप से कमजोर युवा पीढी से यह उम्मीद नहीं की वह इंकलाब की मशाल अपने हाथों में थामेंगे। साम्प्रदायिक और पूँजीवादी नेताओं से क्या उम्मीद करें कि वे कोई 'जनकल्याणकारी'बजट पेश करगे और देशके 'वास्तविक गरीब'आदमी को उसका हक प्रदान करेंगे ?आधुनिक और भविष्य की दुनिया के लिए यही सबसे तकलीफदेह स्थिति है। श्रीराम तिवारी !
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