रविवार, 26 फ़रवरी 2017

वोटर को दोष देना उचित नहीं है ।

''साहब , अाज समास्या यह हे कि व्यक्ति दौ-मुहाँ हो गया हे , जब खुद के अधिकारो की बात अाती हे सरकारी कार्मचारियो के सन्दर्भ मे तो उसे कम्युनिस्ट पार्टी से प्रेम होता हे , लेकिन वही व्यक्ति जब वोट देने बुथ पर जाता हे तो उसकी प्रतिब्धता बदल जाती हे ? यह विचारणीय अौर हास्यास्पद नही हे क्या ?''

उक्त त्रुटिपूर्ण अनगढ़ वाक्यांश श्री 'रिज़ खान' साहब की उस टिप्पणी से उद्धृत किया गया है जो उन्होंने मेरी एक पोस्ट के सन्दर्भ में की है। उनके उक्त वाक्यांश को पढ़ने से लगता है कि उन्होंने तमाम भारतीय मतदाताओं को 'दोमुहाँ' कहा है। मैं उक्त शब्द चयन की भर्त्सना करता हूँ। वैसे कोई परिपक्व वामपंथी व्यक्ति इस तरह की शब्दावली का प्रयोग नहीं करता। लेकिन रिज़ खान ने सवाल सही उठाया है। हालांकि यह सवाल बहुत पहले सीपीएम के वरिष्ठ कामरेड स्वर्गीय आर उमानाथ ने ,लगभग ३० साल पहले एआईआईईए के अखिल भारतीय मद्रास अधिवेशन में उठाया था।

कामरेड आर उमानाथ का सवाल था की ''संगठित क्षेत्र के मजदूर/कर्मचारी /अधिकारी  एकजुट होकर अपने वेतन भत्ते बढ़वाने के लिए तो लाल झण्डा हाथ में लेकर 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा लगाते हैं ,हड़ताल में भी शामिल होते हैं ,सरकार की आलोचना करते हैं ,किन्तु जब कभी आम चुनाव होते हैं तो वे कम्युनिस्ट पार्टियों को वोट नहीं करते।''सभी जानते हैं कि यही वर्ग चेतना का संकट है। जब मजदूर-किसान के अपने हितों पर संकट आया तो 'लाल सलाम' बोलने लगे .और जब  मतलब निकल गया तो पूँजीवादी ,साम्प्रदायिक और क्षेत्रीय पार्टियों को वोट दे आये।
५०-६० साल पहले के  ज़माने में मुंबई , इंदौर,कानपुर, अहमदाबाद , हैदराबाद और बेंगलोर की सड़कों पर लाल झंडाही लहराता था। ट्रेड यूनियन आंदोलन की ताकत इतनी थी कि उन पर फिल्में भी बना करतीं थीं। उस ज़माने में भी सारे मजदूर-किसान  वामपंथ को वोट नहीं दे पाते  थे। वर्ग चेतना का उचित विकास न होने से या वामपंथ का उम्मीदवार  न होने से वे कहीं पर बाल ठाकरे की शिवसेनाको ,कहीं पर दत्ता सामन्त की यूनियनको, कहीं पर किसान नेता शरद जोशी के शेतकरी संघटना को ,कहीं पर तेलगुदेशम को ,कहीं पर मुस्लिम लीग को , कहीं पर द्रमुक को ,कहीं पर जनसंघ को और कहीं पर कांग्रेस को वोट दिया करते थे। किन्तु अंतर्राष्टीय परिदृश्य में सोवियत पराभव और भारत में साम्प्रदायिक ,मजहबी उन्माद के कारण वामपंथ को जबरजस्त धक्का लगा है। जातीयतावाद ,क्षेत्रियतावादी और नव्य पूँजीवाद ने आधुनिक युवाओं को विचारधारा विमुख कर दिया है। वामपंथ ने भी देश काल के प्रतिकूल गंभीर भूलें कीं हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों में आजादी के बाद अब तक १० बार विभाजन हो चुका है। नक्सलवाद -संशोधनवाद ने तो वामपंथ का कबाड़ा किया ही है।किन्तु कुछ खास वामपंथी नेताओं के अहंकार ने भी भारत में वामपंथ को बहुत नुकसान पहुंचाया है। यदि उम्मीदवार ही खड़ा नहीं करेंगे तो मतदाता चाहे मजूर हो या किसान हो वोट तो देगा। अब वो किसे देता है यह उसके स्थानीय सरोकारों,धर्म,जात और क्षेत्र भाषा पर निर्भर है। भारतीय राजनीति की यह अयाचित बुराई है। कोई पसन्द करे या न करे। इसलिए किसी भी तरह से वोटर को दोष देना उचित नहीं है । श्रीराम तिवारी !

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