मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

यूपी में सही विकल्प मौजूद ही नहीं है !

यू,पी ,बिहार,एमपी,हरियाणा जैसे हिंदी भाषी  प्रान्तों के आधुनिक पतनशील  राजनैतिक तंत्र को देख सुनकर जिस किसी का मन बाकई दुखी होता हो, जिन्हें यह भ्रम हो कि राजनीति में चारित्रिक  पतन सिर्फ इस दौर का ही विशिष्ठ गुण है ,वे महान व्यंग सम्राट श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास 'राग दरवारी'अवश्य पढ़े। जिन्हें यह आभास हो रहा हो  कि राजनीति के कारण यूपी, बिहार,पंजाब,हरियाणा  का अधम चारित्रिक पतन हो चुका है वे उस पुस्तक को अवश्य पढ़ें। जिन्होंने 'राग दरबारी' पढ़ा है वे बखूबी जानते हैं कि न केवल यूपी बिहार बल्कि लगभग पूरा देश ही 'शिवपालगंज' हो चुका है। पचास साल पहले लिखे गए उपन्यास 'राग दरबारी' के पात्रों का चरित्र भी वर्तमान लुच्चों, लफंगों,,गुंडों ,दवंगों ,मुन्ना भाइयों,और सत्ता के दलालों से कमतर नहीं था। वास्तव में पार्टियों या नेताओं ने नहीं बल्कि अशिक्षित उज्जड समाजों के भेड़िया धसान चरित्र ने उत्तर भारत की राजनीति को चरम पतन के खड्ड में धकेला है। सामंती कबीलाई समाज के रहन सहन,खान-पान,चाल -ढाल और पहनावे में फर्क आया है ,लेकिन सोच में कोई फर्क नहीं आया है। निहित स्वार्थी सामंती मानसिकता ही साम्प्रदायिक और जातीयतावादी  चुनावी राजनीति की मददगार बनती है। इसी कारण  भारत में  विचार आधारित राजनीति को सफलता नहीं मिल पा रही है। कोई लेपटॉप मुफ्त  देकर वोट हासिल करता है ,कोई जुमलों वादों से जीत हासिल करना चाहता है. कोई भृष्ट तरीके अपनाकर सत्ता सुख पाना चाहता है ,कोई आरक्षणकी वैशाखी पकड़कर, धर्म-मजहब की ढपली बजाकर राजनैतिक ताकत बढ़ाना चाहता है। कोई वैज्ञानिक विचारधारा आधारित सर्वहारा क्रांति का तलबगार है। बिकट  हालात में देश की मेहनतकश आवाम को आर्थिक -सामाजिक बदलाव की कोई राह नजर नहीं आ रही ही।   

''संगठित क्षेत्र के मजदूर/कर्मचारी /अधिकारी एकजुट होकर अपने वेतन भत्ते बढ़वाने के लिए तो लाल झण्डा हाथ में लेकर 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा लगाते हैं ,हड़ताल में भी शामिल होते हैं ,सरकार की आलोचना करते हैं ,किन्तु जब कभी आम चुनाव होते हैं तो वे कम्युनिस्ट पार्टियों[वामपंथ] को वोट नहीं करते।''सभी जानते हैं कि यह वर्ग चेतना का संकट है। जब मजदूर-किसान के अपने हितों पर संकट आया तो 'लाल सलाम' के नारे लगाने लगे .और जब मतलब निकल गया तो पूँजीवादी ,साम्प्रदायिक और क्षेत्रीय पार्टियों को वोट दे आये।

वेशक आधुनिक लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था यद्द्पि सामन्तवादी शासन व्यवस्था से बेहतर है,किन्तु चुनावी प्रक्रिया की खामियों और 'दुष्प्रचार'से भ्रमित मतदाता वास्तविक जनादेश नहीं दे पाते। भारत की चुनाव प्रक्रिया और प्रणाली दोनों हो दोषपूर्ण हैं। इस सिस्टम में इतने छेद हैं कि पता लगाना मुश्किल है कि देश के लिए  मुफीद क्या है? और लोकतंत्र के लिए बाजिब क्या है? भारतीय राजनीति की तमाम विकृतियों के गढ़ उत्तरप्रदेश में हो रहे चुनावोंमें जो खास पार्टियाँ मैदान में हैं उनमें से दूधका धुला कोई नेता या दल नहीं है। भाजपा केवल मोदीके भरोसे है,मोदीजी फूहड़ राजनीति एवं काल्पनिक 'हिंदुत्व के भरोसे हैं। कांग्रेस केवल सपा और राहुल के भरोसे है। सपा अपने युवा नेता अखिलेश यादव और सत्ता के भरोसे है। अखिलेश यादव अपने 'दवँग परिवार' जातिवाद और अल्पसंख्यक वर्ग के भरोसे है। वसपा बहिन जी के भरोसे है। मायावतीजी दलित ,मुस्लिम और ब्राह्मण की सोशल इंजीनियरिंग के भरोसे हैं । इनमें कोई भी जीते ;हारना जनता को ही है !क्योंकि यूपी में सही विकल्प मौजूद ही नहीं है ! श्रीराम तिवारी

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