शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

आत्मघाती नीतियों पर पुनर्विचार जरुरी है !


आधुनिक सामाजिक -आर्थिक जीवन उस दिशा में अग्रसर हो रहा है ,जिसकी सैद्धान्तिक भविष्यवाणियां मार्क्स-एंगेल्स ने कीं थीं। वैज्ञानिक-टेक्नॉलाजिकल और उन्नत सूचना संचार प्रौद्दोगिकी के चरम की ओर बढ़ते इंसान के कदम ,किसी मजबूत आधार पर नहीं टिके हैं।वेशक विज्ञान और टेक्नॉलॉजी ने विकास की असीम सम्भावनाएँ प्रकट कीं हैं।किन्तु विकसित पूँजीवादी देशों में 'आर्थिक मंदी' के खतरे साथ बेतहाशा बेरोजगारी भी बढ़ रही है। भारत जैसे विकासशील देश में बेरोजगारों की स्थिति पहले से ही भयानक है ,अर्थ व्यवस्था बेहद उलझी हुई है। केवल अशिक्षित अथवा अर्ध शिक्षित युवाओं को ही नहीं बल्कि उच्चशिक्षित तकनीकी ज्ञानसे समृद्ध युवा पीढी के बेरोजगारों को भी मजबूरन निजी क्षेत्रकी गुलामी करनी पड़ रही है। भुखमरी दूसरी सबसे बड़ी समस्या है ,तीसरी समस्या 'बेघर'लोगों की है , जो अपना सम्पूर्ण जीवन अभावों में गुजारने को बाध्य हैं। यह स्थिति केवल आधुनिक भारत की ही नहीं है। बल्कि कर्जखोर, मुनाफाखोर -विकसित पूँजीवादी दुनिया भी इस बीमारी से ग्रस्त है। बम्फर बेलआउट पैकेज और सब्सिडी के वावजूद यूरोप-अमेरिका की आर्थिक आपात स्थितिबेकाबू है। इसके वावजूद भारत के सत्तारूढ पूँजीवादी नेता इतिहास से सबक सीखने के बजाय उनकी ही घातक नीतियों का अंधानुकरण किये जा रहे हैं। वे आत्मघाती नीतियों पर पुनर्विचार के लिए  बिलकुल तैयार नहीं हैं।चूँकि  इस दौर के युवाओं को आर्थिक अध्यन में अधिक रूचि नहीं है , इसलिए वे स्वविवेक से महरूम होकर चुनावों के समय नेता विशेष के वाणी विलास पर रीझ जाते हैं। अपने जाति ,समाज,धर्म-मजहब के 'नेता' को हीरो मानकर ,अपना भविष्य उसके हवाले कर देते हैं जो अपने ईमान और कौल का पक्का नहीं है और खुद राजनीतिक मृग मरीचिका में जी रहा है।

ताजा खबर है कि कोई 'द वीक- हंसा ' ने मौजूदा विधान सभा चुनावों के लिए जनमत सर्वेक्षण किया है। 'द वीक - हंसा' के सर्वे में बताया गया है कि 'नोटबंदी' का इन चुनावों पर कोई प्रतिगामी असर नहीं पड़ने वाला । पंजाब को छोड़ बाकी अन्य चारों  प्रान्तों में भाजपा के जीतने की प्रबल संभावनाएं बताईं गईं हैं। यदि सर्वे बाकई सच साबित हुआ ,तब भी मैं यही कहूँगा कि 'नोटबंदी' का फैसला एक अहमक और आत्मघाती फैसला था। वैसे पंजाब और यूपी के चुनावों पर देश दुनिया की नजर टिकी हुई है। अन्य राज्यों में तो चुनावी हार जीत के स्थानीय कारण ही मान्य होंगे। यूपी के चुनाव में यदि भाजपा की जीत हुई तो उसका श्रेय मोदीजी को  मिलेगा। इससे फोकट के श्रेय से देश के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पडेगा। फोकट काश्रेय इसलिए कि कांग्रेस सपा,वसपा की हार के विश्लेषण कुछ इस तरह होंगे ! यह सच है कि यूपी में कांग्रेस और वामपंथ बहुत कमजोर हो चुके हैं। लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल भैया ने पीके की सलाह पर वसपा ,सपा के खिलाफ, खटिया आंदोलन चलाकर धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने जो भी किया वह सब सही था। लेकिन अल्पसंख्यक मतों के ध्रवीकरण को रोकने के लालचमें जब उन्होंने सपा[अखिलेश यादव] को गले लगाया तो मोदी जी के 'मन की बात' हो गई ! खुदा न खास्ता सपा +कांग्रेस यदि हार जाते हैं तो कहा जायेगा की 'यादव कुल कलह' ने डुबोया !यदि बहिनजी हारतीं हैं तो कहा जायेगा कि उनका 'नोटबन्दी'विरोध और जातीय उन्माद उन्हें ले डूबा !और भाजपा यदि जीत जाती है तो कहा जायेगा 'मोदी जी 'की नीतियों ने जितवा दिया। बाकीतो सब ठीकहै, लेकिन मोदी जी यदि यूपी में भाजपा को जिता ले गए तो मुल्क की खैर नहीं। क्योंकि उनकी नीतियों भारत को बरबादी की ओर ले जा रहीं हैं। इसलिए  यूपी में भाजपा की हार यदि होती है तो यह देश हित में होगा।

कुछ 'देशभक्त' मित्रों और 'भाइयो-बहिनों' को यह जानकर दुःख होगा कि मोदी जी के ढाई साल के शासन काल में अब तक बहुत सी बातें 'पहली बार' हुईं हैं। उनमें से दो अभी ताजा घटनाएँ हैं। एक घटना हमारे मध्यप्रदेश की है। एमपी में अभी-अभी आधा दर्जन से अधिक पाकिस्तानी एजेंट्स पकडे गए हैं। उनके नाम 'दैनिक भास्कर' के अनुसार इस प्रकार हैं ;-सर्वश्री बलरामसिंह ,कुश पंडित ,कुँअर जितेंद्रसिंह ठाकुर ,रीतेश खुल्लर ,जीतेन्द्र यादव और त्रिलोक सिंह भदौरिया ! एक बन्दा तो देशभक्त पार्टी का स्थानीय पदाधिकारी  बताया जा रहा है। नासमिटे कांग्रेसियों  ने ७० साल में यह नहीं किया !और एक ख़ास बात, इस सूची में 'गद्दार कौम' का कोई बन्दा नहीं है ! 'भाइयों -बहिनों क्या बताऊँ ! कहीं इस 'पहली बार'की शर्मनाक घटना से कोई शर्म-हयादार 'देशभक्त' कहीं चुल्लू भर पानीमें डूबकर न मर जाए !

'भाइयों बहिनों' मोबाइल को कुछ देर के लिए स्विच ऑफ़ कीजिये !आँखे खोलकर ध्यान से कोई राष्ट्रीय अखबार पढ़िए ! भारत के नजदीक अरब की खाड़ी में पाकिस्तान नेवी द्वारा आयोजित युद्धाभ्यास 'अमन-१७' में दुनिया के ३७ देशों की नेवल फ़ोर्स एक साथ सामूहिक युद्धाभ्यास में जुटे हैं।ऐंसा 'पहली बार' हो रहा है कि दुनिया के प्रमुख ३७ देशों में मोदी मित्र 'ट्रम्प,शिंजो आबे ,पुतिन और शी जिन पिंग के देश अपने  नेवल युद्धपोत लेकर भारत को धमकाने के लिए एकजुट हैं। निसन्देह यह 'पहली बार हो रहा है। मोदी सरकार की शानदार विदेश नीति और श्री धोवाल साहब का शानदार -जानदार व्यक्तित्व चारों खाने चित्त पड़े हैं। निसंदेह भारत असुरक्षित है,पहली बार ! मोदी सरकार की एक और उपलब्धि है जो  'पहली बार' प्राप्त हुई है ,कलेजा थामकर' नोट कीजिये ! हमारे बहुत से जाबांज फौजी इन दिनों फ़ौज की नौकरी छोड़ रहे हैं या फरार हो रहे हैं। यह टन्टा भी 'पहली बार' ही हो रहा है। इकबाल साहब की पंक्ति याद आ रही है ;-वतन की फ़िक्र कर नादाँ  मुसीबत आने वाली है ,,,,,,,,!        

आधुनिक युवाओं को 'वैज्ञानिक कम्युनिज्म' तो बहुत बड़ी बात है, संसदीय लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों की भी जानकारी नहीं है। जब आधुनिक एमबीए,एमसीए और तमाम उच्च डिग्रीधारी युवाओंको ही नहीं मालूम कि कार्ल -मार्क्स कौन थे ? ऐतिहासिक द्वन्दात्मकता क्या है ? वर्गीय समाज में उत्पादन सम्बन्ध व उनके अन्तःसम्बन्ध क्या हैं ? ऐतिहासिक भौतिकवाद क्या है ? कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक 'डास केपिटल' में विस्तार से और 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो 'में सारतत्व के रूपमें इन तमाम विषयोंका वैज्ञानिक विश्लेषण किया है। फ्रांसीसी क्रांति और अक्टूबर क्रांति ने  इन सिद्धान्तों और स्थापनाओं को मानवीय आधार उपलब्ध कराया। जन -समस्यायों के बरक्स वैज्ञानिक हल खोजे गए। लेकिन उन शिक्षाओं का समुचित अध्यन मार्क्सवादी ही नहीं करते तो लम्पट अपढ़ गंवार युवाओं से क्या उम्मीद करें ? भावजगत में पली बढ़ी और नैतिक रूप से कमजोर युवा पीढी से यह उम्मीद नहीं की वह  इंकलाब की मशाल अपने हाथों में थामेंगे। साम्प्रदायिक और पूँजीवादी नेताओं से क्या उम्मीद करें कि वे कोई 'जनकल्याणकारी'बजट पेश करगे और देशके 'वास्तविक गरीब'आदमी को उसका हक प्रदान करेंगे ?आधुनिक और भविष्य की दुनिया के लिए यही सबसे तकलीफदेह स्थिति है। श्रीराम तिवारी !

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें