शुक्रवार, 10 मार्च 2017


यूपी उत्तराखण्ड [पहले एक ही राज्य के हिस्से थे ] के अलावा हर जगह भाजपा हार रही है। गोवा,मणिपुर और पंजाब में कांग्रेस बुलंदियों पर है ,फिर भी सारा मीडिया और हो हल्लेबाज केवल यूपी -यूपी चिल्ला रहे हैं। कहीं यह वितंडावादतो नहीं है ?

भले ही सारा संसार यूपी में भाजपा की जीत का श्रेय मोदीजी को देता रहे, किन्तु मेरा यह यकीन अब भी पक्का है कि भाजपा की इस जीत का श्रेय  यादववाद,कैरानावाद और मायावाद को दिया जाना चाहिए।   

पता नही यह किस तरह का लोकतंत्र है?

उत्तराखण्ड,यूपी,पंजाब,ग़ोवा और मणिपुर विधान सभा के चुनाव सम्पन्न हो गए। रिजल्ट भी कमोवेश एग्जिट पोल के अनुरूप ही आये हैं। इन परिणामों से बहुत सारे लोग निराश हैं, लेकिन जनादेश का सम्मान करने के अलावा उनके पास अब कोई विकल्प नहीं है। यूपी में जो हुआ वह बिहार में भी होने ही वाला था, किन्तु 'महागठबंधन' ने तब मोदीजी के अश्वमेध का घोडा रोक लिया था। बिहार में तो जातिवाद जीत गया था और 'राष्ट्रवाद'-विकाशवाद हार गया था !दूरगामी दृष्टि से मौजूदा पाँच विधान सभा चुनावों का निष्पक्ष विश्लेषण करने वाले जागरूक व्यक्ति को देश काल परिस्थतियों पर गौर अवश्य करना चाहिए।प्रगतिशील वामपंथी साथियों को यह सुखद सूचना है कि यूपी में भले ही उन्हें विजय न मिल पायी हो,किन्तु आइंदा 'वर्ग संघर्ष' तेज करने में उधर नकली समाजवाद और जातीयतावाद  की अड़चन कुछ कम रहेगी।क्योंकि सपा के नकली समाजवाद और बहिनजी के जातिवाद को गहरी चोट पहुंची है। यूपी की जनता ने यदि नोटबन्दी की तकलीफ भुलाकर ,जुमलों और फिकरों पर यकीन किया है तो इसके लिए यूपी के नकली 'समाजवादीगुंडे',असली परिवारवादी ,जातिवादी-अल्पसंख्यकवादी तत्व ही जिम्मेदार हैं। इसमें भाजपा वालों को प्रफुल्लित होकर 'भगोरिया'डांस करने की जरूरत नहीं !

'सर्वहारा वर्ग' को लोकतान्त्रिक निर्वाचन प्रक्रिया से इंद्रलोक की राज्यसत्ता तो प्राप्त हो सकती है ,किन्तु बिहार उत्तरप्रदेश ,एमपी राजस्थान जैसे हिंदी भाषी प्रान्तों में उसे कभी कोई उल्लेखनीय जीत हासिल नहीं हो सकती। इसके कारणों की विवेचना करने के बजाय  जिम्मेदार वामपंथी बुध्दिजीवी और नेता फोकट के बौध्दिक तावीज अपने गले में लटकाये भारतीय सन्सदीय राजनीति के बियावान में भटक रहे हैं। बहरहाल अभी के पाँच राज्यों में सम्पन्न विधान सभा चुनावों में वामपंथ को पहले से ही वहाँ खास उम्मीद नहीं थी ।क्योंकि जहाँ खानदानी नकली समाजवादी हों,जहाँ सामंती अवशेष के रूप में सदियोंसे गुंडाराज रहा हो,जहाँ बरसों से दलितजनों और पिछड़ों को जातिवाद की 'जन्मघुट्टी' पिलाई जाती रही हो,वहाँ 'वर्ग संघर्ष' और सर्वहारा क्रांति की संभावनाएं क्या खाक होंगी?इसलिए अच्छा हुआ कि यूपी में जनता ने एक बड़े 'दवंग' को जिता दिया। क्योंकि यू पी के सरकारी दवंगों, अल्पसंख्यकवादियों और जातिवादियों के प्रति नरम रुख के चलते वामपंथ को वहाँ पहले कोई स्पेस नहीं था।अब चूँकि कट्टर साम्प्रदायिक -कट्टर पूँजीवादी भाजपा यूपी राज्य की सत्ता मेंआ गई है ,इसलिए उचित वक्त आने पर जनता को साथ लेकर 'वर्गसंघर्ष' छेड़ा जा सकता है। इसलिए छुद्रतम राजनीति करनेवालों को ठिकाने लगाकर-बहरहाल तो ,यूपी की जनता ने  उचित ही किया है !केंद्र की मोदी सरकार विकास के बरक्स अब यह बहाना नहीं बना सकती कि राज्य और केंद्र में उचित तालमेल नहीं है।

 पंजाब में मजहब आधारित वोट की राजनीति करते-करते 'शिरोमणि अकालीदल'वालों ने हैवानियत की हद पार कर दलाई थी। न केवल राज्यकोष घाटा बढ़ाते रहने बल्कि पाकिस्तान प्रेरित नशाखोरी में अकालीदल के लोगों की संलिप्तता और पंजाब पुलिस भी बदनाम  रही है।अब जाकर पंजाब को उस दोहरे संकट से निजात मिली है ! उत्तराखण्ड को हरीश रावत की मूर्खता से निजात मिली है और ग़ोवा-मणिपुर की जनता कोभी स्थायित्व मिला है।
इन चुनावों में किसी राज्य ने कुछ नहीं खोया। बल्कि किसी भी राजनैतिक दल ने कुछ खास नहीं खोया। सभीको वह मिला जिसका वो हकदार था। कांग्रेस को उत्तराखण्ड के अलावा सभी राज्योंमें पहले से कुछ ज्यादा समर्थन हांसिल हुआ है।यह बात जुदा है कि अतीत की बदनामी और मोदीका जादू उनको सत्ता में आने से रोक रहा है। पँजाबमें तो कांग्रेसके हाथसे 'आप'ने ही विजय छीनीहै !उत्तराखण्ड में कांग्रेसको भाजपाका दलबदल अभियान और कांग्रेस के अंदर का भीतरघात ले डूबा।

कुल मिलाकर इन चुनावों में किसी ने कुछ खास नहीं खोया। वेशक यूपी में भाजपा को कुछ ज्यादा ही मिला है ! फिर भी यह खंडित जनादेश ही है। क्योंकि २०१४ में भाजपा का यूपी में जो वोट प्रतिशत था वो अब नहीं रहा !मोदीजी की मेहनत,केंद्र सरकार की मशीनरी ,बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद और यूपी के मुलायम परिवार की अंदरूनी लड़ाई ने भाजपा को यूपी में विजय श्री दिलाई है। यही सच है ,इसमें कोई शक नहीं ! इस चुनाव में जो जमानत खो बैठे ,वे इसी लायक थे। किन्तु जो अपनों के भीतरघात से हारे ,जिन्हें बहुत कम वोटों से हार का मुँह देखना पड़ा ,वे अवश्य ही इस आधे-अधूरे लोकतंत्र के मारे हैं। उनके लिए चुनावी हार का खामियाजा इसलिए भोगं होगा क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में यह एक बड़ी खामी है कि किसी को दो लाख वोट मिल गए तो जीत गया और किसी को उससे सिर्फ एक वोट काम मिला तो वो हार गया। पता नही यह किस तरह का लोकतंत्र है कि हारने वाले के लाखों वोट इसलिए बेकार हो गए ,क्योंकि उसे एक वोट कम मिला ?

गुरुवार, 9 मार्च 2017


 विगत शताब्दी के आठवें दशक तक दुनिया में दो महाशक्तियाँ हुआ करतीं थीं, 'सोवियत यूनियन' याने आज का 'रूसी फेडरेशन' और 'संयुक्त राज्य अमेरिका' ! लेकिन पेंटागन और सीआईए की चालों में आकर येल्तसिन और गोर्बाचेव जैसे मूर्खोंने सोवियत क्रांतिका भट्टा बिठा दिया। इसलिए १९९० के बादसे दुनिया में सिर्फ एक महाशक्ति याने 'अमेरिका' का ही दबदबा चला आ रहा है। लेकिन  विगत २० जनवरी -२०१७ के बाद से अमेरिका पर ट्रम्प नामक राहु की सुदृष्टि पड़ चुकी है। डोनाल्ड ट्रम्प के व्हाइट हॉउस प्रवेशके उपरान्त अमेरिका अब महाशक्ति के पद पर ज्यादा दिन नहीं रह सकेगा। अब नस्लवादी अमेरिकन उग्र होने लगे हैं। वे चुन-चुन कर भारतीयों को मार रहे हैं या उनका अमेरिका में रहना मुश्किल कर रहे हैं। हैरान परेशान अप्रवासी अमेरिकन्स को ट्रम्प के 'भारतीय मित्र' की प्रतिक्रिया का इन्तजार है !

यूपी चुनाव के अंतिम दिन काशीवास के उपरान्त पी एम मोदीजी आनन् -फानन गुजरात पहुंचे। वहाँ उन्होंने दो बड़े कार्यक्रमों में शिरकत की !पहला कार्यक्रम किसी बहुउद्देशीय योजना के शुभारम्भ का 'दहेज़'में था। दूसरा कार्यक्रम 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस' पर गांधीनगर में सम्पन्न हुआ। मैंने दोनों ही कार्यक्रम डीडीवन पर लाइव देखे। दोनों ही कार्यक्रमों में मुझे कुछ ऐंसा नही मिला जिसे आलोचना के लिए सहेज सकूँ। किन्तु एक रोचक चीज अवश्य देखने -सुनने में आई। दोनों  ही कार्यक्रमों के मंच की सम्पूर्ण बानगी और विषय सामग्री सिर्फ हिंदी में थी। वहाँ न गुजराती थी ,न अंग्रेजी। जो वक्ता मोदी जी से पहले बोले वे सभी हिंदी में बोले। लोकसभा अध्यक्षा श्रीमती सुमित्रा महाजन तो हिंदी भाषी हैं ही किन्तु  मोदीजी और गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर सूत्रधार तक सभी केवल हिंदी में बोले। बात सिर्फ हिंदी भाषा की नही थी बल्कि विषयवस्तु का सारतत्व भी समसामयिक और जरुरी था। मैंने मोदी जी समेत सभी उपस्थित आफीसर्स और महिला प्रतिनिधियों के लंबे भाषण पूरी तन्मयता से सुने,ताकि उनके भाषणों पर शानदार आलोचना पेश करसकूँ। किन्तु दोनोंही कार्यकमोंमें मुझे ऐंसा कुछ नहीं मिला जिसकी आलोचना कर सकूँ!मेरी इस पोस्ट को इस संदर्भ में पढ़ा जाए कि खुद मैंने अपने अतीत में पूरे ४० साल सम्पूर्ण भारत में ट्रेड यूनियन कांफ्रेंस अटेंड की हैं। उत्तरभारत के अलावा जहाँ भी गया ,पूर्व ,पष्चिम,में तो फिर भी कहीं -कहीं एक दो हिंदी के शब्द सुनने में आ जाते थे। किन्तु केरल,कर्नाटक,आंध्र, तमिलनाडु,बंगाल,उड़ीसा,उत्तर-पूर्व में अधिकांस कामकाज क्षेत्रीय भाषाओं अथवा अंग्रेजी में ही होता रहाहै । तमिलनाडु में तो हिंदी के शब्दों पर कोलतार पुता हुआ होता था।अब पता नही। लेकिन गुजरात में दोनों कार्यक्रम विशुद्ध हिंदी में देखकर हतप्रभ हूँ।

बुधवार, 8 मार्च 2017

शुक्रिया जनाब सरताज अहमद साहिब !


श्री नरेन्द्र मोदी जी ने जबसे भारत के प्रधान मंत्री पद का भार ग्रहण किया है ,तबसे उन्होंने उतने ही शब्द मुखरित किये हैं,जितने कि आसमान में तारे हैं। वेशक उनका प्रत्येक शब्द बड़े काम का हुआ करता है,लेकिन व्यक्तिगत रूप से उनका एक भी शब्द मेरे किसी काम का नहीं। मुझे अभीतक एकभी निर्धन किसान,मजदूर या वेरोजगार नौजवान नहीं मिला जिसने स्वीकार किया हो कि मोदी जी के सत्ता में आने से या उनके 'बोल बच्चन' से उसे कुछ हासिल हुआ हो या उसके अच्छे दिन आये हों ! इस मामले में सिर्फ मोदीजी ही अनोखे नहीं हैं कि वे जिस पार्टी के नेता रहे हैं ,प्रधानमंत्री भी जैसे सिर्फ उसी पार्टी के होकर रह गए हैं। गैर भाजपाई जनता को और विपक्ष को सिर्फ जुमलों,अनैतिक हमलों का बोझ ढोना पड़ रहा है।

वैसे आजादी के बाद पं नेहरू को छोड़कर शायद ही ऐंसा कोई प्रधान मंत्री हुआ हो जिसने भारतीय लोकतंत्र की परवाह की हो ! लाल बहादुर शास्त्री जी अवश्य कुछ लोकतान्त्रिक व्यक्ति थे किन्तु वे शीघ्र ही स्वर्ग सिधार गए ! उनके बाद के अधिकांस प्रधानमंत्रियों की यह विशेषता रही है कि जिस पार्टी ने उन्हें  संसदीय दल का नेता या  पीएम् बनाया,वे उसीके होकर रह गए। इंदिराजी ने और राजीवजी ने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, हम उनके प्रति युगों-युगों तक आभारी रहेंगे ,किन्तु विपक्ष के प्रति और असहमतों के प्रति उनके मन में भी दुराव कम नहीं था ! भारतीय लोकतंत्र की यह दुखद बिडम्बना रही है कि जो भी सत्तामें आया सिर्फ अपनी पार्टी का ही होकर रह गया । पार्टीहित साध्य हो गया ,देश -समाज और आवाम उसके लिए सिर्फ साधन बनकर रह गए !

लखनऊ में मारा गया आतंकी सैफुल्लाह इस्लाम के नाम पर कलंक कहा जा सकता है। भारत में अब सैफुल्लाह शब्दभी कसाबकी तरह अपवित्र होगया,किन्तु उसके 'वालिद' सरताज अहमदका नाम,दीन ए इस्लामके इतिहास में और भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पन्नों पर लिखा जाएगा। जनाब सरताज अहमद ने अपने आतंकी बेटे का शव ठुकराकर उन लोगों को जूता सुंघाया है,जिन्हें दुनिया का हर मुसलमान आतंकी नजर आता है। उनके इस निर्णय से उन लोगों को भी नसीहत मिली जो यह मान बैठे हैं कि भारत में आतंकवाद है ही नहीं और  बेकसूर लोगों को सताया जा रहा है। शुक्रिया जनाब सरताज अहमद साहिब !

शुक्रवार, 3 मार्च 2017


उज्जैन के जिस 'संघ सह प्रचारक' डा.कुंदन चंद्रावत ने केरल के मुख्यमंत्री 'पिनराई विजयन' का सिर काटने का इनाम घोषित किया था, संघ ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया है।संघियों को अक्ल आई,धन्यवाद ! उज्जैन की पुलिस ने डॉ कुंदन चंद्रावत पर धारा ५०५ के तहत कायमी की है। जो 'नकली देशभक्त' शोसल मीडिया पर और टीवी चेनल्स पर, वामपंथ तथा केरल सरकार के खिलाफ लगातार अरण्यरोदन किये जा रहे हैं ,वे ज़रा रुककर सांस लें लेवें । उनके लिए आज की नई दुनिया के फ्रंट पेज पर दुखद खबर यह है कि 'संघ' के शीर्ष नेतत्व ने डा. चन्द्रावत को बाहर करने के साथ -साथ, केरल की तथाकथित रक्तरंजित खबरों पर भी यूटर्न ले लिया है। केरल के प्रमुख 'संघ प्रचारक' ने खुद मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की तारीफ की है।वहाँ जिन झड़पों को साम्प्रदायिक रंग दिया जा रहा है उनमें संघ के सदस्य नही बल्कि तश्कर,स्मगलर और बम बनाने वाले अपराधी अपनी मौत मरे हैं। माकपा और केरल सरकार को बदनाम करने से 'संघ परिवार' के नम्बर नहीं बढ़ने वाले,शायद संघ के वरिष्ठों को यह समझ है ! चूँकि 'हिंदुत्ववादी' अभी तक गाँधीजी की हत्या से मुक्त नहीं हो पाए हैं ! शायद इसी वजह से राकेश सिन्हा, संबित पात्रा ,किरण रिजूजी,अनिल बिज पर अभी भी वामपंथ की सवारी जारी है।
 
अपनी किशोरवय में हम जब कभी किसी से लड़ते -झगड़ते थे, तो हमारे बुजुर्ग नसीहत दिया करते थे कि -
''दुश्मनी जबभी करो, जमकर करो ,किन्तु यह ध्यान रहे कि जब कभी जिंदगी में मिलना पडे, तो  शर्मिंदा न हों !''

पूंजीवादी लोकतंत्र मूलत : एक कलहप्रिय व्यवस्था है।इसका चुनाव सिस्टम भ्रष्ट पूँजी और 'दवंगों'के नियंत्रण में होता है, इसलिए यह किसी भी देश के लिए आदर्श या अंतिम विकल्प नहीं है। हालाँकि यह सामंतवादी व्यवस्था से कुछ बेहतर ही है। इसीलिये जब तक इससे बेहतर विकल्प के रूप में किसी जन -कल्याणकारी व्यवस्था का इंतजाम न हो जाए ,तब तक इस धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणतन्त्र की रक्षा अनिवार्य है। किन्तु यदि किसी के पास 'वामपंथ' के अलावा इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का कोई अन्य बेहतर विचार अथवा समस्थानिक विकल्प है, तो वे उसे जनता के समक्ष पेश करे। लेकिन 'हिन्दुराष्ट्र' समर्थक तो एक मुख्यमंत्री का सिर काटने का फ़तवा जारी करते हैं और सिर काटने वाले को एक करोड़ रुपये का इनाम देंने को तैयार बैठे हैं।

वामपंथी साथियों को भी अपने उदात्त आचरण से देश की जनता को यह बताना चाहिए कि उनके प्रकल्प की गारन्टी क्या है ? हालाँकि वामपंथ ने विगत एक शताब्दी पहले ही  दुनिया में खुल्लमखुल्ला ऐलान कर दिया था  कि वे शोषणविहीन समानता आधारित  शासन व्यवस्था के हिमायती हैं। उनका संकल्प है कि क्रांति के उपरान्त वे व्यक्ति, समाज  राष्ट्र को वर्तमान से बेहतर उच्चतर स्तर पर ले जाएंगे। हालाँकि जब तक यह क्रांतिकारी सोच देश दुनिया के हर मेहनतकश मजूर किसान और नौजवान तक नहीं पहूंचती तब तक इन्तजार करना होगा।

तीन साल पहले तक भारतीय राजनीति में फूहड़ मजाक और ठिलवई केवल बिहार में लालू यादव जैसे नेताओं तक सीमित थी। राजनीति में जब जहाँ गंभीरतापूर्वक चिंतन और विवेकपूर्ण दायित्व की आवश्यकता हो,वहाँ हंसी मसखरी की एक सीमा होना चाहिए। किन्तु जबसे केंद्र में मोदी सरकार आई है तबसे पूरा भारतही फूहड़ता और बदमिजाजी की गिरफ्तमें आ चुका है। हरेक सरकारका दायित्व है कि मुल्क में और मुल्ककी सीमाओं पर अमन हो!लेकिन हमारे मंत्री और सत्ता पक्ष के नेता ''चढ़ जा बेटा सूली पै राम बहाली करेंगे'' तर्ज पर देश के सैनिकों को बार-बार शहादत के लिए उकसाते रहते हैं। जैसे कि उन्हें अपनी फ़ौज पर यकीन न हो ! कुछ अपरिपक्व नेताओं और मंत्रियों के बयानों से पडोसी देश की सेना और उनके पालतू आतंकी भी ज्यादा तैयारी और आक्रामकता से पेश आ रहे हैं ! देश के अंदर पक्ष-विपक्ष में कोई सम्वाद नहीं है !चुनावी माहौल में जहर उगला जा रहा है। फिर भी कुछ रतोंधी ग्रस्त लोग कह रहे हैं कि 'अच्छे दिन आये हैं '!

एक साल में कामरेड कन्हैया कुमार,खालिद उमर और अन्य जेएनयू छात्रसंघ पदाधिकारियों के खिलाफ जब दिल्ली पुलिस और केंद्र की ख़ुफ़िया एजंसियों को कुछ सबूत नहीं मिला तो 'देशभक्तों' ने कन्हैया कुमार के साथी छात्र-छात्राओं पर अश्लील दुष्प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया है। कुछ निर्लज्ज तो सज्जाद जहीर और फैज अहमद फैज की कब्र तक पहुँच गए। उन्होंने जेएनयू के इतिहास,भूगोल और समाजशाश्त्र का खूब अध्यन किया,किन्तु वे यह क्यों नहीं जानना चाहते कि आधा उनके आधा दर्जन भाजपाई नेताओं के दामाद मुस्लिम ही हैं। यदि मेरी बात किसी को गलत लगे तो आडवाणी जी,मुरली मनोहरजी ,तरुण विजयजी और इंदेशकुमारजी से तस्दीक कर ले !

गुरुवार, 2 मार्च 2017

''तुलसी हाय गरीब की ,कबहुँ न निष्फल जाय'' !

घास के कई प्रकारकी होती हैं ,उत्तर भारत में मुशयाल,गौनैय्या ,कांदी ,काँस और गाजरघास इत्यादि प्रमुख हैं ! काँस और गाजरघास कोई पशु भी नहीं खाता। अधिकान्स ढोरोपयोगी घास तभी उगती है जब धरतीमें पर्याप्त नमी हो या वर्षात का मौसम हो। किन्तु काँस और गाजरघास को कुदरत ने शायद अमरत्व प्रदान किया है, कि वे  किसीभी जगह,किसीभी मौसममें, बिना सिचाई के,बिना देखभाल के,अपने आप बढ़ते रहते हैं। इसी तरह दुनिया के कुछ धर्म- मजहब स्वतःस्फूर्त रूप से कट्टरवादी हैं। वे अपने आप परवान चढ़ते रहते हैं, क्योंकि उनपर शैतान सवार  है। इन कट्टरपंथी साम्प्रदायिक संगठनों को खत्म करने की कोशिश बेकार है। ये  रक्तबीज हैं.ये तो 'काटे पै कदरी फरे' के उदाहरण हैं। इन्हें काटोगे तो और ज्यादा कोंपलें फूटने लगेंगी। इन मजहबी और साम्प्रदायिक कट्टरपंथियों पर, साम्प्रदायिक संगठनों पर शैतान हमेशा प्रशन्न रहता है। इसीलिये कभी वे सलमान रुश्दी के सिर काटने का इनाम और फतवा जारी करते हैं ,कभी वे केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का सिर काट कर लाने का इनाम घोषित करते हैं।

 नियति का सिद्धांत है कि समय किसी का सदा एक सा नहीं रहता। १२ साल में घूरे के भी दिन फिरते हैं। विगत  ढाई-तीन साल से देश में सहिष्णुता,धर्मनिपेक्षता और मेहनतकशों की विचारधारा पर निरन्तर हमले होते रहे हैं। इस हमले में धर्म-मजहब का चोला ओढ़ने वाले अधिकान्स बाबा -स्वामी भी शामिल रहे हैं! लेकिन सुखद खबर यह है कि स्वामी रामदेव अब सोच समझकर बोलने लगे हैं ,यूपी के चुनावमें उन्होंने किसीका साथ नहीं दियाहै। उन्होंने जनता को लोकतंत्र की असल ताकत बतायाहै। उनकी जय हो !श्री श्री श्री रविशंकर जी  जबसे बस्तर की यात्रा से लौटे हैं काफी गंभीर दिख रहे हैं। दो मार्च को प्रकाशित स्थानीय दैनिक प्रभातकिरण के  फ्रंट पेज पर श्री श्री का बयान मेरे दिल को छू गया।उनके बयान का सार यह है -[१]जयंती ,पुण्यतिथि पर छुट्टियाँ बंद करो। [२]जात -पांत, धर्म-मजहब पर वोट मांगना बन्द करो।[३] लोकतंत्र में वामपंथ और दक्षिणपंथ सभी को अभिव्यक्ति की आजादी है,कोई भी इसे छीन नहीं सकता ! जय हो ! यदि श्री श्री पर किसी राजनीतिक स्वार्थ का कोई भूत सवार न हुआ हो, और उनपर नक्सलवादियों का असर न हुआ हो ,तो उनका यह हृदय परिवर्तन स्वागत योग्य है ! लेकिन  वे यदि अपने कारपोरेट सिस्टम को बस्तर से लेकर पाकिस्तान में फैलाने के लिए धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुतासमर्थन का स्वांग धारण कर रहे हैं ,तो 'खुदा' या ईश्वर भले ही उन्हें माफ़ कर दे, किन्तु ''तुलसी हाय गरीब की ,कबहुँ न निष्फल जाय''  !  श्रीराम तिवारी    

बुधवार, 1 मार्च 2017


यदि कोई अहमक किसी सार्वजनिक मंच पर 'संबित पात्रा' से कहे कि 'बोल तूँ अपने बाप की औलाद है' तो इस तरहकी अभद्र शब्दावली से  किसीका भी मूड ऑफ हो सकताहै! लेकिन संबित पात्राको शायद यह भाषा पसन्द है,तभी तो उन्होंने टीवी चेनल पर 'कविता कृष्णन' को चिड़ाते हुए कहा 'बोलो कश्मीर भारत का हिस्सा है,' संबित के इस अप्रत्याशित आदेश पर कविता कृष्णन तो क्या कोईभी हड़बड़ा सकता था, कि यह तो बातचीत का हिस्सा ही नहीं,और कश्मीर जब भारत काअभिन्न हिस्सा है तो इसमें संवित पात्रा को शक क्यों है ? कविता कृष्णन कोई जबाब देती,इससे पहलेही संबित ने 'अश्वत्थामा हतो नरो वा कुन्जरो वा' का नाटक अभिनीत कर दिया! जय हो!

विगत लोक सभा चुनाव में साम्प्रदायिक दुष्प्रचार सफल रहा और दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावाद को पूर्ण बहुमत मिल गया। कांग्रेस सहित अन्य धर्मनिरपेक्ष दल तथा वामपंथको सफलता नहीं मिली। तब चुनाव परिणाम आने के बाद एक 'देशभक्त' ने मेरी वाल पर अनपेक्षित टिप्पणी की थी। उसने लिखाथा की 'केरल और त्रिपुराको छोड़कर सारे भारत में वामपंथ का सफाया हो गया है। इसी तरह एक अन्य संकीर्णतावादी ने भी तब लिखा था कि - 'दुनिया में वामपंथ अर्थात कम्युनिज्म का अब कोई भविष्य नहीं'। इन सात्विक और आप्त बचनों को सुनने के बाद,मैंने भी मान लिया कि बाकई भारत में कम्युनिज्म अर्थात गरीबों-किसानों -मजूरोंकी विचारधाराका कोई भविष्य नहीं है !लेकिन आये दिन जो घटनाएं घट रहीं हैं और  संबित,खंडित,ऱण्डित मंडित जैसे लोग वामपंथ पर विष वमन कर रहे हैं ,उससे लगता है कि 'वामपंथ' तो अभीभी गरज रहा है ,न केवल गरज रहाहै बल्कि कहीं-कहीं बरस भी रहा है। तमाम कट्टरपंथी और साम्प्रदायिक लोग वामपंथ से डरे हुए हैं !अभी पिछले हफ्ते मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने अचानक जब कहा कि 'मुझसे बड़ा कोई कम्युनिस्ट नहीं 'तो अखबार में यह खबर पढ़कर माँ बदौलत गदगद हो गए। इतना मस्का तो जायज है कि हमारे सी. एम.चाहे जैसे भी हों,किन्तु वे नर्मदा मैया की कृपा से वामपंथकी विचारधाराको बहुत सम्मान दे रहे हैं। ये बात जुदाहै कि बेचारे केरलके मुख्यमंत्रीको भोपाल में केरल के लोगों से ही नहीं मिलने दिया। उधर कभी जेएनयू में ,कभी डीयू में ,कभी सोशल मीडिया ,कभी टीवी चेनल्सपर ,कभी सन्सद में और कभी देश में संघी भाइयों को 'वाम-वाम'चिल्लाते देखकर मुझे बड़ा ताज्जुब हो रहा है कि वामपंथका भूत  यथावत है। अब यकीन हो चला है कि वामपंथ अजर-अमर है और भस्मीभूत रतिपति कामदेव की तरह 'अनंग' के रूप में वह संघियों और पूँजीपतियों के तन -मन को खुजला रहा है।शायद इसीलिये वे वाम-वाम चील रहे हैं ! श्रीराम तिवारी !