शुक्रवार, 10 मार्च 2017

पता नही यह किस तरह का लोकतंत्र है?

उत्तराखण्ड,यूपी,पंजाब,ग़ोवा और मणिपुर विधान सभा के चुनाव सम्पन्न हो गए। रिजल्ट भी कमोवेश एग्जिट पोल के अनुरूप ही आये हैं। इन परिणामों से बहुत सारे लोग निराश हैं, लेकिन जनादेश का सम्मान करने के अलावा उनके पास अब कोई विकल्प नहीं है। यूपी में जो हुआ वह बिहार में भी होने ही वाला था, किन्तु 'महागठबंधन' ने तब मोदीजी के अश्वमेध का घोडा रोक लिया था। बिहार में तो जातिवाद जीत गया था और 'राष्ट्रवाद'-विकाशवाद हार गया था !दूरगामी दृष्टि से मौजूदा पाँच विधान सभा चुनावों का निष्पक्ष विश्लेषण करने वाले जागरूक व्यक्ति को देश काल परिस्थतियों पर गौर अवश्य करना चाहिए।प्रगतिशील वामपंथी साथियों को यह सुखद सूचना है कि यूपी में भले ही उन्हें विजय न मिल पायी हो,किन्तु आइंदा 'वर्ग संघर्ष' तेज करने में उधर नकली समाजवाद और जातीयतावाद  की अड़चन कुछ कम रहेगी।क्योंकि सपा के नकली समाजवाद और बहिनजी के जातिवाद को गहरी चोट पहुंची है। यूपी की जनता ने यदि नोटबन्दी की तकलीफ भुलाकर ,जुमलों और फिकरों पर यकीन किया है तो इसके लिए यूपी के नकली 'समाजवादीगुंडे',असली परिवारवादी ,जातिवादी-अल्पसंख्यकवादी तत्व ही जिम्मेदार हैं। इसमें भाजपा वालों को प्रफुल्लित होकर 'भगोरिया'डांस करने की जरूरत नहीं !

'सर्वहारा वर्ग' को लोकतान्त्रिक निर्वाचन प्रक्रिया से इंद्रलोक की राज्यसत्ता तो प्राप्त हो सकती है ,किन्तु बिहार उत्तरप्रदेश ,एमपी राजस्थान जैसे हिंदी भाषी प्रान्तों में उसे कभी कोई उल्लेखनीय जीत हासिल नहीं हो सकती। इसके कारणों की विवेचना करने के बजाय  जिम्मेदार वामपंथी बुध्दिजीवी और नेता फोकट के बौध्दिक तावीज अपने गले में लटकाये भारतीय सन्सदीय राजनीति के बियावान में भटक रहे हैं। बहरहाल अभी के पाँच राज्यों में सम्पन्न विधान सभा चुनावों में वामपंथ को पहले से ही वहाँ खास उम्मीद नहीं थी ।क्योंकि जहाँ खानदानी नकली समाजवादी हों,जहाँ सामंती अवशेष के रूप में सदियोंसे गुंडाराज रहा हो,जहाँ बरसों से दलितजनों और पिछड़ों को जातिवाद की 'जन्मघुट्टी' पिलाई जाती रही हो,वहाँ 'वर्ग संघर्ष' और सर्वहारा क्रांति की संभावनाएं क्या खाक होंगी?इसलिए अच्छा हुआ कि यूपी में जनता ने एक बड़े 'दवंग' को जिता दिया। क्योंकि यू पी के सरकारी दवंगों, अल्पसंख्यकवादियों और जातिवादियों के प्रति नरम रुख के चलते वामपंथ को वहाँ पहले कोई स्पेस नहीं था।अब चूँकि कट्टर साम्प्रदायिक -कट्टर पूँजीवादी भाजपा यूपी राज्य की सत्ता मेंआ गई है ,इसलिए उचित वक्त आने पर जनता को साथ लेकर 'वर्गसंघर्ष' छेड़ा जा सकता है। इसलिए छुद्रतम राजनीति करनेवालों को ठिकाने लगाकर-बहरहाल तो ,यूपी की जनता ने  उचित ही किया है !केंद्र की मोदी सरकार विकास के बरक्स अब यह बहाना नहीं बना सकती कि राज्य और केंद्र में उचित तालमेल नहीं है।

 पंजाब में मजहब आधारित वोट की राजनीति करते-करते 'शिरोमणि अकालीदल'वालों ने हैवानियत की हद पार कर दलाई थी। न केवल राज्यकोष घाटा बढ़ाते रहने बल्कि पाकिस्तान प्रेरित नशाखोरी में अकालीदल के लोगों की संलिप्तता और पंजाब पुलिस भी बदनाम  रही है।अब जाकर पंजाब को उस दोहरे संकट से निजात मिली है ! उत्तराखण्ड को हरीश रावत की मूर्खता से निजात मिली है और ग़ोवा-मणिपुर की जनता कोभी स्थायित्व मिला है।
इन चुनावों में किसी राज्य ने कुछ नहीं खोया। बल्कि किसी भी राजनैतिक दल ने कुछ खास नहीं खोया। सभीको वह मिला जिसका वो हकदार था। कांग्रेस को उत्तराखण्ड के अलावा सभी राज्योंमें पहले से कुछ ज्यादा समर्थन हांसिल हुआ है।यह बात जुदा है कि अतीत की बदनामी और मोदीका जादू उनको सत्ता में आने से रोक रहा है। पँजाबमें तो कांग्रेसके हाथसे 'आप'ने ही विजय छीनीहै !उत्तराखण्ड में कांग्रेसको भाजपाका दलबदल अभियान और कांग्रेस के अंदर का भीतरघात ले डूबा।

कुल मिलाकर इन चुनावों में किसी ने कुछ खास नहीं खोया। वेशक यूपी में भाजपा को कुछ ज्यादा ही मिला है ! फिर भी यह खंडित जनादेश ही है। क्योंकि २०१४ में भाजपा का यूपी में जो वोट प्रतिशत था वो अब नहीं रहा !मोदीजी की मेहनत,केंद्र सरकार की मशीनरी ,बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद और यूपी के मुलायम परिवार की अंदरूनी लड़ाई ने भाजपा को यूपी में विजय श्री दिलाई है। यही सच है ,इसमें कोई शक नहीं ! इस चुनाव में जो जमानत खो बैठे ,वे इसी लायक थे। किन्तु जो अपनों के भीतरघात से हारे ,जिन्हें बहुत कम वोटों से हार का मुँह देखना पड़ा ,वे अवश्य ही इस आधे-अधूरे लोकतंत्र के मारे हैं। उनके लिए चुनावी हार का खामियाजा इसलिए भोगं होगा क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में यह एक बड़ी खामी है कि किसी को दो लाख वोट मिल गए तो जीत गया और किसी को उससे सिर्फ एक वोट काम मिला तो वो हार गया। पता नही यह किस तरह का लोकतंत्र है कि हारने वाले के लाखों वोट इसलिए बेकार हो गए ,क्योंकि उसे एक वोट कम मिला ?

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