शुक्रवार, 3 मार्च 2017

पूंजीवादी लोकतंत्र मूलत : एक कलहप्रिय व्यवस्था है।इसका चुनाव सिस्टम भ्रष्ट पूँजी और 'दवंगों'के नियंत्रण में होता है, इसलिए यह किसी भी देश के लिए आदर्श या अंतिम विकल्प नहीं है। हालाँकि यह सामंतवादी व्यवस्था से कुछ बेहतर ही है। इसीलिये जब तक इससे बेहतर विकल्प के रूप में किसी जन -कल्याणकारी व्यवस्था का इंतजाम न हो जाए ,तब तक इस धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणतन्त्र की रक्षा अनिवार्य है। किन्तु यदि किसी के पास 'वामपंथ' के अलावा इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का कोई अन्य बेहतर विचार अथवा समस्थानिक विकल्प है, तो वे उसे जनता के समक्ष पेश करे। लेकिन 'हिन्दुराष्ट्र' समर्थक तो एक मुख्यमंत्री का सिर काटने का फ़तवा जारी करते हैं और सिर काटने वाले को एक करोड़ रुपये का इनाम देंने को तैयार बैठे हैं।

वामपंथी साथियों को भी अपने उदात्त आचरण से देश की जनता को यह बताना चाहिए कि उनके प्रकल्प की गारन्टी क्या है ? हालाँकि वामपंथ ने विगत एक शताब्दी पहले ही  दुनिया में खुल्लमखुल्ला ऐलान कर दिया था  कि वे शोषणविहीन समानता आधारित  शासन व्यवस्था के हिमायती हैं। उनका संकल्प है कि क्रांति के उपरान्त वे व्यक्ति, समाज  राष्ट्र को वर्तमान से बेहतर उच्चतर स्तर पर ले जाएंगे। हालाँकि जब तक यह क्रांतिकारी सोच देश दुनिया के हर मेहनतकश मजूर किसान और नौजवान तक नहीं पहूंचती तब तक इन्तजार करना होगा।

तीन साल पहले तक भारतीय राजनीति में फूहड़ मजाक और ठिलवई केवल बिहार में लालू यादव जैसे नेताओं तक सीमित थी। राजनीति में जब जहाँ गंभीरतापूर्वक चिंतन और विवेकपूर्ण दायित्व की आवश्यकता हो,वहाँ हंसी मसखरी की एक सीमा होना चाहिए। किन्तु जबसे केंद्र में मोदी सरकार आई है तबसे पूरा भारतही फूहड़ता और बदमिजाजी की गिरफ्तमें आ चुका है। हरेक सरकारका दायित्व है कि मुल्क में और मुल्ककी सीमाओं पर अमन हो!लेकिन हमारे मंत्री और सत्ता पक्ष के नेता ''चढ़ जा बेटा सूली पै राम बहाली करेंगे'' तर्ज पर देश के सैनिकों को बार-बार शहादत के लिए उकसाते रहते हैं। जैसे कि उन्हें अपनी फ़ौज पर यकीन न हो ! कुछ अपरिपक्व नेताओं और मंत्रियों के बयानों से पडोसी देश की सेना और उनके पालतू आतंकी भी ज्यादा तैयारी और आक्रामकता से पेश आ रहे हैं ! देश के अंदर पक्ष-विपक्ष में कोई सम्वाद नहीं है !चुनावी माहौल में जहर उगला जा रहा है। फिर भी कुछ रतोंधी ग्रस्त लोग कह रहे हैं कि 'अच्छे दिन आये हैं '!

एक साल में कामरेड कन्हैया कुमार,खालिद उमर और अन्य जेएनयू छात्रसंघ पदाधिकारियों के खिलाफ जब दिल्ली पुलिस और केंद्र की ख़ुफ़िया एजंसियों को कुछ सबूत नहीं मिला तो 'देशभक्तों' ने कन्हैया कुमार के साथी छात्र-छात्राओं पर अश्लील दुष्प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया है। कुछ निर्लज्ज तो सज्जाद जहीर और फैज अहमद फैज की कब्र तक पहुँच गए। उन्होंने जेएनयू के इतिहास,भूगोल और समाजशाश्त्र का खूब अध्यन किया,किन्तु वे यह क्यों नहीं जानना चाहते कि आधा उनके आधा दर्जन भाजपाई नेताओं के दामाद मुस्लिम ही हैं। यदि मेरी बात किसी को गलत लगे तो आडवाणी जी,मुरली मनोहरजी ,तरुण विजयजी और इंदेशकुमारजी से तस्दीक कर ले !

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