बुधवार, 1 मार्च 2017


यदि कोई अहमक किसी सार्वजनिक मंच पर 'संबित पात्रा' से कहे कि 'बोल तूँ अपने बाप की औलाद है' तो इस तरहकी अभद्र शब्दावली से  किसीका भी मूड ऑफ हो सकताहै! लेकिन संबित पात्राको शायद यह भाषा पसन्द है,तभी तो उन्होंने टीवी चेनल पर 'कविता कृष्णन' को चिड़ाते हुए कहा 'बोलो कश्मीर भारत का हिस्सा है,' संबित के इस अप्रत्याशित आदेश पर कविता कृष्णन तो क्या कोईभी हड़बड़ा सकता था, कि यह तो बातचीत का हिस्सा ही नहीं,और कश्मीर जब भारत काअभिन्न हिस्सा है तो इसमें संवित पात्रा को शक क्यों है ? कविता कृष्णन कोई जबाब देती,इससे पहलेही संबित ने 'अश्वत्थामा हतो नरो वा कुन्जरो वा' का नाटक अभिनीत कर दिया! जय हो!

विगत लोक सभा चुनाव में साम्प्रदायिक दुष्प्रचार सफल रहा और दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावाद को पूर्ण बहुमत मिल गया। कांग्रेस सहित अन्य धर्मनिरपेक्ष दल तथा वामपंथको सफलता नहीं मिली। तब चुनाव परिणाम आने के बाद एक 'देशभक्त' ने मेरी वाल पर अनपेक्षित टिप्पणी की थी। उसने लिखाथा की 'केरल और त्रिपुराको छोड़कर सारे भारत में वामपंथ का सफाया हो गया है। इसी तरह एक अन्य संकीर्णतावादी ने भी तब लिखा था कि - 'दुनिया में वामपंथ अर्थात कम्युनिज्म का अब कोई भविष्य नहीं'। इन सात्विक और आप्त बचनों को सुनने के बाद,मैंने भी मान लिया कि बाकई भारत में कम्युनिज्म अर्थात गरीबों-किसानों -मजूरोंकी विचारधाराका कोई भविष्य नहीं है !लेकिन आये दिन जो घटनाएं घट रहीं हैं और  संबित,खंडित,ऱण्डित मंडित जैसे लोग वामपंथ पर विष वमन कर रहे हैं ,उससे लगता है कि 'वामपंथ' तो अभीभी गरज रहा है ,न केवल गरज रहाहै बल्कि कहीं-कहीं बरस भी रहा है। तमाम कट्टरपंथी और साम्प्रदायिक लोग वामपंथ से डरे हुए हैं !अभी पिछले हफ्ते मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने अचानक जब कहा कि 'मुझसे बड़ा कोई कम्युनिस्ट नहीं 'तो अखबार में यह खबर पढ़कर माँ बदौलत गदगद हो गए। इतना मस्का तो जायज है कि हमारे सी. एम.चाहे जैसे भी हों,किन्तु वे नर्मदा मैया की कृपा से वामपंथकी विचारधाराको बहुत सम्मान दे रहे हैं। ये बात जुदाहै कि बेचारे केरलके मुख्यमंत्रीको भोपाल में केरल के लोगों से ही नहीं मिलने दिया। उधर कभी जेएनयू में ,कभी डीयू में ,कभी सोशल मीडिया ,कभी टीवी चेनल्सपर ,कभी सन्सद में और कभी देश में संघी भाइयों को 'वाम-वाम'चिल्लाते देखकर मुझे बड़ा ताज्जुब हो रहा है कि वामपंथका भूत  यथावत है। अब यकीन हो चला है कि वामपंथ अजर-अमर है और भस्मीभूत रतिपति कामदेव की तरह 'अनंग' के रूप में वह संघियों और पूँजीपतियों के तन -मन को खुजला रहा है।शायद इसीलिये वे वाम-वाम चील रहे हैं ! श्रीराम तिवारी ! 

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