विगत शताब्दी के आठवें दशक तक दुनिया में दो महाशक्तियाँ हुआ करतीं थीं, 'सोवियत यूनियन' याने आज का 'रूसी फेडरेशन' और 'संयुक्त राज्य अमेरिका' ! लेकिन पेंटागन और सीआईए की चालों में आकर येल्तसिन और गोर्बाचेव जैसे मूर्खोंने सोवियत क्रांतिका भट्टा बिठा दिया। इसलिए १९९० के बादसे दुनिया में सिर्फ एक महाशक्ति याने 'अमेरिका' का ही दबदबा चला आ रहा है। लेकिन विगत २० जनवरी -२०१७ के बाद से अमेरिका पर ट्रम्प नामक राहु की सुदृष्टि पड़ चुकी है। डोनाल्ड ट्रम्प के व्हाइट हॉउस प्रवेशके उपरान्त अमेरिका अब महाशक्ति के पद पर ज्यादा दिन नहीं रह सकेगा। अब नस्लवादी अमेरिकन उग्र होने लगे हैं। वे चुन-चुन कर भारतीयों को मार रहे हैं या उनका अमेरिका में रहना मुश्किल कर रहे हैं। हैरान परेशान अप्रवासी अमेरिकन्स को ट्रम्प के 'भारतीय मित्र' की प्रतिक्रिया का इन्तजार है !
यूपी चुनाव के अंतिम दिन काशीवास के उपरान्त पी एम मोदीजी आनन् -फानन गुजरात पहुंचे। वहाँ उन्होंने दो बड़े कार्यक्रमों में शिरकत की !पहला कार्यक्रम किसी बहुउद्देशीय योजना के शुभारम्भ का 'दहेज़'में था। दूसरा कार्यक्रम 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस' पर गांधीनगर में सम्पन्न हुआ। मैंने दोनों ही कार्यक्रम डीडीवन पर लाइव देखे। दोनों ही कार्यक्रमों में मुझे कुछ ऐंसा नही मिला जिसे आलोचना के लिए सहेज सकूँ। किन्तु एक रोचक चीज अवश्य देखने -सुनने में आई। दोनों ही कार्यक्रमों के मंच की सम्पूर्ण बानगी और विषय सामग्री सिर्फ हिंदी में थी। वहाँ न गुजराती थी ,न अंग्रेजी। जो वक्ता मोदी जी से पहले बोले वे सभी हिंदी में बोले। लोकसभा अध्यक्षा श्रीमती सुमित्रा महाजन तो हिंदी भाषी हैं ही किन्तु मोदीजी और गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर सूत्रधार तक सभी केवल हिंदी में बोले। बात सिर्फ हिंदी भाषा की नही थी बल्कि विषयवस्तु का सारतत्व भी समसामयिक और जरुरी था। मैंने मोदी जी समेत सभी उपस्थित आफीसर्स और महिला प्रतिनिधियों के लंबे भाषण पूरी तन्मयता से सुने,ताकि उनके भाषणों पर शानदार आलोचना पेश करसकूँ। किन्तु दोनोंही कार्यकमोंमें मुझे ऐंसा कुछ नहीं मिला जिसकी आलोचना कर सकूँ!मेरी इस पोस्ट को इस संदर्भ में पढ़ा जाए कि खुद मैंने अपने अतीत में पूरे ४० साल सम्पूर्ण भारत में ट्रेड यूनियन कांफ्रेंस अटेंड की हैं। उत्तरभारत के अलावा जहाँ भी गया ,पूर्व ,पष्चिम,में तो फिर भी कहीं -कहीं एक दो हिंदी के शब्द सुनने में आ जाते थे। किन्तु केरल,कर्नाटक,आंध्र, तमिलनाडु,बंगाल,उड़ीसा,उत्तर-पूर्व में अधिकांस कामकाज क्षेत्रीय भाषाओं अथवा अंग्रेजी में ही होता रहाहै । तमिलनाडु में तो हिंदी के शब्दों पर कोलतार पुता हुआ होता था।अब पता नही। लेकिन गुजरात में दोनों कार्यक्रम विशुद्ध हिंदी में देखकर हतप्रभ हूँ।

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